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अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग

भगवद गीता
28 श्लोक • केवल अनुवाद
अर्जुन बोले - हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसको कहा गया है? और अधिदैव किसको कहा जाता है?
यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस देह में कैसे है? हे मधूसूदन ! नियतात्मा (वशीभूत अन्तःकरण वाले) मनुष्य के द्वारा अन्तकाल में आप कैसे जानने में आते हैं?
श्रीभगवान् बोले - परम अक्षर ब्रह्म है और जीव का अपना जो होनापन है, उसको अध्यात्म कहते हैं। प्राणियों का उद्भव (सत्ता को प्रकट) करने वाला जो त्याग है उसको कर्म कहा जाता है।
हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! क्षरभाव अर्थात् नाशवान् पदार्थ को अधिभूत कहते हैं, पुरुष अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी अधिदैव हैं और इस देह में अन्तर्यामीरूप से मैं ही अधियज्ञ हूँ।
जो मनुष्य अन्तकाल में भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरुप को ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।
हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है वह उस (अन्तकाल के) भाव से सदा भावित होता हुआ उस-उसको ही प्राप्त होता है अर्थात् उस-उस योनि में ही चला जाता है।
इसलिये तू सब समय में मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मेरे में मन और बुद्धि अर्पित करने वाला तू निःसन्देह मेरे को ही प्राप्त होगा।
हे पृथानन्दन ! अभ्यासयोग से युक्त और अन्यका चिन्तन न करने वाले चित्त से परम दिव्य पुरुष का चिन्तन करता हुआ (शरीर छोड़ने वाला मनुष्य) उसी को प्राप्त हो जाता है।
जो सर्वज्ञ, पुराण, शासन करने वाला, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, सबका धारण-पोषण करने वाला, अज्ञान से अत्यन्त परे, सूर्य की तरह प्रकाशस्वरूप - ऐसे अचिन्त्य स्वरूप का चिन्तन करता है।
वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्तसमय में अचल मन से और योगबल के द्वारा भृकुटी के मध्य में प्राणों को अच्छी तरह से प्रविष्ट करके (शरीर छोड़ने पर) उस परम दिव्य पुरुष को ही प्राप्त होता है।
वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं और साधक जिसकी प्राप्ति की इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद मैं तेरे लिये संक्षेप से कहूँगा।
(इन्द्रियों के) सम्पूर्ण द्वारों को रोक कर मन का हृदय में निरोध करके और अपने प्राणों को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में सम्यक् प्रकार से स्थित हुआ
जो साधक 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर को छोड़कर जाता है, वह परमगति को प्राप्त होता है।
हे पृथानन्दन ! अनन्यचित्त वाला जो मनुष्य मेरा नित्य-निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसको सुलभता से प्राप्त हो जाता हूँ।
महात्मा लोग मुझे प्राप्त करके दुखालय और अशाश्वत पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते; क्योंकि वे परमसिद्धि को प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्रेम की प्राप्ति हो गयी है।
हे अर्जुन ! ब्रह्मलोक तक सभी लोक पुनरावर्ती है; परन्तु हे कौन्तेय! मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।
जो मनुष्य ब्रह्मा के एक हज़ार चतुर्युगी वाले एक दिन को और सहस्त्र चतुर्युगी पर्यन्त एक रात को जानते हैं, वे मनुष्य ब्रह्मा के दिन और रात को जानने वाले हैं।
ब्रह्माजी के दिन के आरम्भकाल में अव्यक्त- (ब्रह्माजी के सूक्ष्म-शरीर) से सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं और ब्रह्माजी की रात के आरम्भकाल में उसी अव्यक्त में सम्पूर्ण प्राणी लीन हो जाते हैं।
हे पार्थ! वही यह प्राणि समुदाय उत्पन्न हो हो कर प्रकृति के परवश हुआ ब्रह्मा के दिन के समय उत्पन्न होता है और ब्रह्मा की रात्रि के समय लीन होता है।
परन्तु उस अव्यक्त (ब्रह्माजी के सूक्ष्म शरीर) से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियों के नष्ट होने पर भी नाश नहीं होता।
उसी को अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसी को परमगति कहा गया है तथा जिस को प्राप्त होने पर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है।
हे पृथानन्दन अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्यभक्ति से प्राप्त होने योग्य है।
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! जिस काल अर्थात् मार्ग में शरीर छोड़कर गये हुए योगी अनावृत्ति को प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर नहीं आते और (जिस मार्ग में गये हुए) आवृत्ति को प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर आते हैं, उस काल को अर्थात् दोनों मार्गों को मैं कहूँगा।
जिस मार्ग में प्रकाशस्वरूप अग्नि का अधिपति देवता, दिन का अधिपति देवता, शुक्लपक्ष का अधिपति देवता, और छः महीनों वाले उत्तरायण का अधिपति देवता है, शरीर छोड़कर उस मार्ग से गये हुए ब्रह्मवेत्ता पुरुष (पहले ब्रह्मलोक को प्राप्त होकर पीछे ब्रह्माजी के साथ) ब्रह्म को प्राप्त हो जाते हैं।
जिस मार्ग में धूम का अधिपति देवता, रात्रि का अधिपति देवता, कृष्णपक्ष का अधिपति देवता और छः महीनों वाले दक्षिणायन का अधिपति देवता है, शरीर छोड़कर उस मार्ग से गया हुआ योगी (सकाम मनुष्य) चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर लौट आता है अर्थात् जन्म-मरण को प्राप्त होता है।
क्योंकि शुक्ल और कृष्ण - ये दोनों गतियाँ अनादिकाल से जगत् (प्राणिमात्र) के साथ सम्बन्ध रखने वाली मानी गई हैं। इनमें से एक गति में जाने वाले को लौटना नहीं पड़ता और दूसरी गति में जाने वाले को लौटना पड़ता है।
हे पृथानन्दन ! इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। अतः हे अर्जुन! तू सब समय में योगयुक्त हो जा।
योगी इस को (शुक्ल और कृष्णमार्ग के रहस्य को) जानकर वेदों में, यज्ञों में, तपों में तथा दान में जो जो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी पुण्यफलों का अतिक्रमण कर जाता है और आदिस्थान परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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