Krishjan
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अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
भगवद गीता
42 श्लोक • केवल अनुवाद
भगवान ने कहा
— मैंने इस
अविनाशी योग
को सूर्यदेव
(विवस्वान)
को बताया था।
विवस्वान
ने इसे
मनु
को कहा, और
मनु
ने इसे
इक्ष्वाकु
को बताया।
इस प्रकार
यह
योग
परम्परा
से प्राप्त होता आया, और
राजर्षियों
ने इसे जाना। किन्तु काल के प्रभाव से यह
महान योग
इस लोक में लुप्त हो गया,
(हे परन्तप)
।
वही यह
प्राचीन
योग
आज मैंने तुम्हें बताया है। क्योंकि तुम मेरे
भक्त
और
सखा
हो, इसलिए यह अत्यंत
उत्तम रहस्य
है।
अर्जुन ने कहा
— आपका जन्म तो
अभी का
है, जबकि सूर्यदेव
(विवस्वान)
का जन्म बहुत
प्राचीन
है। मैं यह कैसे समझूँ कि आपने ही प्रारम्भ में यह योग बताया था?
भगवान ने कहा
— हे
अर्जुन
, मेरे और तुम्हारे अनेक
जन्म
बीत चुके हैं। मैं उन सभी को जानता हूँ, परन्तु तुम उन्हें नहीं जानते, हे
परन्तप
।
मैं
अजन्मा और अविनाशी
आत्मा
हूँ, फिर भी समस्त प्राणियों का
ईश्वर
हूँ। अपनी
प्रकृति
को अधीन करके मैं अपनी ही
योगमाया
से प्रकट होता हूँ।
जब-जब
धर्म
का पतन होता है, हे
भारत
, और
अधर्म
का उत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
साधुओं
की
रक्षा
के लिए,
दुष्कर्मियों
के
विनाश
के लिए और
धर्म
की पुनः स्थापना के लिए मैं हर
युग
में प्रकट होता हूँ।
जो मेरे
दिव्य जन्म
और
दिव्य कर्म
को तत्त्वतः जान लेता है, हे
अर्जुन
, वह शरीर त्यागने के बाद पुनः
जन्म
को प्राप्त नहीं होता, बल्कि मुझे ही प्राप्त होता है।
जिनके भीतर से
राग
,
भय
और
क्रोध
समाप्त हो गए हैं, जो मेरे
स्वरूप
में स्थित हैं और मेरी शरण में हैं, ऐसे अनेक साधक
ज्ञान
और
तप
से शुद्ध होकर मेरे
भाव
को प्राप्त हुए हैं।
जो जैसे मेरी
शरण
ग्रहण करते हैं, मैं भी उन्हें वैसे ही
अनुग्रह
देता हूँ। हे
पार्थ
, सभी मनुष्य हर प्रकार से मेरे ही
मार्ग
का अनुसरण करते हैं।
इस लोक में जो लोग
कर्मों
की
सिद्धि
की इच्छा रखते हुए विभिन्न
देवताओं
की उपासना करते हैं, उन्हें इस
मानव लोक
में शीघ्र ही अपने
कर्मों से उत्पन्न सिद्धि
प्राप्त हो जाती है।
मेरे द्वारा
चातुर्वर्ण्य
की रचना
गुण
और
कर्म
के विभाग के आधार पर की गई है। हे
अर्जुन
, मुझे ही इसका कर्ता जानो, फिर भी मैं वास्तव में
अकर्ता
और
अव्यय
हूँ।
मेरे
कर्म
मुझे लिप्त नहीं करते और मुझे
कर्मफल
की कोई
इच्छा
नहीं है। जो मुझे इस प्रकार ठीक से जान लेता है, वह अपने
कर्मों
द्वारा बंधन में नहीं पड़ता।
इस प्रकार जानकर ही पूर्वकाल के
मुमुक्षुओं
ने भी
कर्म
किया है। इसलिए तुम भी उसी प्रकार
कर्म
करो, जैसा पहले के महापुरुषों ने किया था।
कई
विद्वान
भी इस विषय में भ्रमित हो जाते हैं कि
कर्म
क्या है और
अकर्म
क्या है। अब मैं तुम्हें वह
कर्म-तत्त्व
समझाऊँगा, जिसे जानकर तुम सभी
अशुभ
से मुक्त हो जाओगे।
कर्म
का स्वरूप जानना चाहिए,
विकर्म
को भी समझना चाहिए, और
अकर्म
को भी जानना आवश्यक है। क्योंकि
कर्म
की गति अत्यंत
गहन
है।
जो व्यक्ति
कर्म
में
अकर्म
देखता है और
अकर्म
में
कर्म
देखता है, वही मनुष्यों में
बुद्धिमान
है, वही
युक्त
है और वही समस्त
कर्मों
का पूर्ण ज्ञाता है।
जिसके सभी
कर्म-प्रारम्भ
कामना
और
संकल्प
से रहित होते हैं, और जिसके
कर्म
ज्ञानाग्नि
में भस्म हो चुके होते हैं, ऐसे व्यक्ति को
बुद्धिमान
(पण्डित)
कहा जाता है।
जो व्यक्ति
कर्मफल
की
आसक्ति
का त्याग कर देता है, जो सदा
संतुष्ट
रहता है और किसी बाह्य
आश्रय
पर निर्भर नहीं होता, वह
कर्म
में प्रवृत्त होने पर भी वास्तव में कुछ भी
कर्म
नहीं करता।
जो व्यक्ति
आशा
से रहित है, जिसका
मन
और
आत्मा
संयमित हैं, और जिसने सभी
परिग्रह
का त्याग कर दिया है, वह केवल
शारीरिक कर्म
करता हुआ भी किसी प्रकार के
पाप
को प्राप्त नहीं होता।
जो व्यक्ति
यदृच्छा से प्राप्त लाभ
में संतुष्ट रहता है,
द्वंद्वों
से परे है और
ईर्ष्या
से रहित है, तथा
सिद्धि
और
असिद्धि
में समान भाव रखता है, वह कर्म करके भी
बंधन
में नहीं पड़ता।
जिसका
आसक्ति
समाप्त हो चुकी है, जो
मुक्त
है और जिसका
चित्त
ज्ञान
में स्थित है, जो सभी कर्म केवल
यज्ञ
के लिए करता है, उसके समस्त
कर्म
पूर्णतः विलीन हो जाते हैं।
अर्पण
भी
ब्रह्म
है,
हवि
भी
ब्रह्म
है,
ब्रह्म
रूप अग्नि में
ब्रह्म
द्वारा ही आहुति दी जाती है। ऐसे
ब्रह्मकर्म-समाधि
से व्यक्ति को अंततः
ब्रह्म
ही प्राप्त होता है।
कुछ
योगी
दैव-यज्ञ
की उपासना करते हैं, जबकि अन्य
ब्रह्माग्नि
में
यज्ञ
को ही
यज्ञ
के माध्यम से आहुति देते हैं।
कुछ लोग
इन्द्रियों
जैसे
श्रोत्र
आदि को
संयम-रूपी अग्नि
में आहुति देते हैं, जबकि अन्य
शब्द
आदि
विषयों
को
इन्द्रिय-रूपी अग्नि
में अर्पित करते हैं।
अन्य साधक अपने सभी
इन्द्रिय-कर्म
तथा
प्राण-कर्म
को
आत्म-संयम योग
रूपी अग्नि में, जो
ज्ञान
से प्रज्वलित है, समर्पित कर देते हैं।
कुछ
यति
कठोर
व्रत
धारण किए हुए
द्रव्य-यज्ञ
करते हैं, कुछ
तप-यज्ञ
करते हैं, कुछ
योग-यज्ञ
में प्रवृत्त रहते हैं, और कुछ
स्वाध्याय
तथा
ज्ञान-यज्ञ
में लगे रहते हैं।
कुछ
योगी
प्राण
को
अपान
में और
अपान
को
प्राण
में आहुति देते हैं। वे
प्राण
और
अपान
की गति को रोककर
प्राणायाम
में पूर्ण रूप से समर्पित रहते हैं।
कुछ अन्य
नियताहार
वाले साधक अपने
प्राणों
को ही प्राणों में आहुति देते हैं। ये सभी
यज्ञवेत्ता
हैं और
यज्ञ
द्वारा अपने
पापों
का क्षय करते हैं।
जो लोग
यज्ञ
के पश्चात बचा हुआ
अमृत
रूपी अंश ग्रहण करते हैं, वे
सनातन ब्रह्म
को प्राप्त होते हैं। हे
कुरुसत्तम
, जो
यज्ञ
नहीं करता, उसके लिए यह लोक भी नहीं है, तो फिर परलोक कैसे संभव होगा।
इस प्रकार अनेक प्रकार के
यज्ञ
ब्रह्म
के मुख से विस्तार को प्राप्त हुए हैं। इन सभी को
कर्म
से उत्पन्न समझो; इस प्रकार जानकर तुम
मुक्ति
को प्राप्त हो जाओगे।
हे
परन्तप
!
द्रव्यमय यज्ञ
की अपेक्षा
ज्ञान-यज्ञ
श्रेष्ठ है। हे
पार्थ
! समस्त
कर्म
पूर्णतः
ज्ञान
में ही समाप्त हो जाते हैं।
उस
ज्ञान
को
प्रणिपात
(नम्रता)
,
परिप्रश्न
(जिज्ञासा)
और
सेवा
के माध्यम से प्राप्त करो।
तत्त्वदर्शी ज्ञानियों
से तुम्हें वह
ज्ञान
प्राप्त होगा, जो तुम्हें उपदेश करेंगे।
जिसे जान लेने के बाद हे
पाण्डव
, तुम फिर कभी इस प्रकार
मोह
को प्राप्त नहीं होगे। उस
ज्ञान
से तुम समस्त
भूतों
को पहले अपने भीतर और फिर
मुझमें
भी देखोगे।
यदि तुम सभी
पापियों
में भी अत्यंत
पापी
हो, तो भी
ज्ञान
रूपी नौका से तुम सभी
पापों
को पार कर जाओगे।
जिस प्रकार प्रज्वलित
अग्नि
ईंधन को भस्म कर देती है, हे
अर्जुन
, उसी प्रकार
ज्ञान
की अग्नि सभी
कर्मों
को भस्म कर देती है।
इस संसार में
ज्ञान
के समान कोई भी
पवित्र
वस्तु नहीं है। जो व्यक्ति
योग
में सिद्ध हो जाता है, वह समय के साथ इस
ज्ञान
को अपने भीतर स्वयं प्राप्त कर लेता है।
जो व्यक्ति
श्रद्धा
से युक्त है,
तत्पर
है और जिसने अपनी
इन्द्रियों
को संयमित किया है, वह
ज्ञान
को प्राप्त करता है। उस
ज्ञान
को प्राप्त करके वह शीघ्र ही
परम शान्ति
को प्राप्त कर लेता है।
जो
अज्ञ
है,
अश्रद्धालु
है और जिसका मन
संशय
से ग्रस्त है, वह नष्ट हो जाता है। ऐसे
संशयात्मा
के लिए न यह लोक है, न परलोक और न ही कोई
सुख
।
हे
धनञ्जय
, जो व्यक्ति
योग
द्वारा अपने
कर्मों
का त्याग कर चुका है, जिसका
संशय
ज्ञान
द्वारा नष्ट हो गया है, और जो
आत्म-स्थित
है, उसे कोई भी
कर्म
बंधन में नहीं डालता।
इसलिए अपने
हृदय
में स्थित
अज्ञान
से उत्पन्न इस
संशय
को अपने
आत्मा
के
ज्ञान-रूपी तलवार
से काट दो। हे
भारत
,
योग
में स्थित होकर उठो।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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