अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।
जो अज्ञ है, अश्रद्धालु है और जिसका मन संशय से ग्रस्त है, वह नष्ट हो जाता है। ऐसे संशयात्मा के लिए न यह लोक है, न परलोक और न ही कोई सुख।
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