Krishjan
🇺🇸 EN
🇮🇳 हिन्दी
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
अध्याय 3 — अरण्यकाण्ड
बरवै रामायण
6 श्लोक • केवल अनुवाद
(चार) अंगुलियों से (चार) वेदों का नाम कहकर (श्रुतिवाचक कानों का संकेत करके) और आकाश में काटने का संकेत करके (उन्हें काट दो, यह सूचित करके प्रभु ने) शूर्पणखा को लक्ष्मणजी के पास भेज दिया।
स्वर्णलता की मूर्ति के समान सीताजी ने कोमलता पूर्वक (किचिंत) मुस्कराकर प्रभु को सोने का मृग दिखला दिया।
जटाओं का मुकुट बनायें, हाथ में धनुष-बाण लिये मारीच के साथ दौड़ते एवं (पीछे से जानकी की ओर) तिरछी दृष्टि से देखते हुए प्रभु की यह चितवनि (गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीजानकीजी के) नेत्रों के मध्य निवास करती है (वे सदा उसी चितवन का चिन्तन करती रहती हैं)।
(जानकी-हरण के पश्चात्) श्रीराम कहते हैं - 'लक्ष्मण! सोने की शलाका, चन्द्रमा की कला, दीपक की शिखा अथवा नक्षत्र के समान (ज्योतिर्मयी) सीता कहाँ है? मुझे यह बता दो'।
श्रीसीता के वर्ण (रूप) के साथ समता करते हुए चित्त में अत्यन्त निराश होकर केतकी-पुष्प ने अपना हृदय फाड़ दिया और (कलङ्क के रूप में) भौंरों की (काली) माला बना (पहिन) लीं।
चन्द्रमा की शीतलता समस्त संसार में व्याप्त हो रही है; किंतु वही (श्री जानकीजी के वियोग में तपे हुए) हमारे शरीर में लगकर अग्नि का-सा ताप धारण कर लेती है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें