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बरवै रामायण • अध्याय 3 • श्लोक 5
सीय बरन सम केतकि अति हियँ हारि। कहेसि भँवर कर हरवा हृदय बिदारि॥
श्रीसीता के वर्ण (रूप) के साथ समता करते हुए चित्त में अत्यन्त निराश होकर केतकी-पुष्प ने अपना हृदय फाड़ दिया और (कलङ्क के रूप में) भौंरों की (काली) माला बना (पहिन) लीं।
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