सीतलता ससि की रहि सब जग छाइ।
अगिनि ताप ह्वै हम कहँ सँसरत आइ॥
चन्द्रमा की शीतलता समस्त संसार में व्याप्त हो रही है; किंतु वही (श्री जानकीजी के वियोग में तपे हुए) हमारे शरीर में लगकर अग्नि का-सा ताप धारण कर लेती है।
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