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अध्याय 1 — आश्रमोपनिषद्

आश्रम
4 श्लोक • केवल अनुवाद
चार आश्रम होते हैं, जिनके सोलह प्रकार बताए गए हैं। ब्रह्मचारी चार प्रकार के होते हैं— गायत्र, ब्राह्मण, प्राजापत्य और बृहन्। जो उपनयन संस्कार के पश्चात् तीन रात्रियों तक लवणरहित भोजन ग्रहण करके गायत्री-जप करता है, उसे गायत्र कहते हैं। जो अड़तालीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदाध्ययन करता है तथा प्रत्येक बारह वर्ष का समय नियोजित करता है, अथवा जब तक वेद का सम्यक् ज्ञान न हो जाए, तब तक ब्रह्मचर्य का पालन करता है (अर्थात् ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए नियमों का पालन करता है), उसे ब्राह्मण कहते हैं। जो अपनी धर्मपत्नी के साथ केवल ऋतुकाल में ही समागम करता है तथा पर-स्त्री के प्रति वासनात्मक सम्बन्ध नहीं रखता, वह प्राजापत्य कहलाता है। अथवा जो चौबीस वर्ष तक गुरुकुल में निवास करे, वह ब्राह्मण और जो अड़तालीस वर्ष तक निवास करे, वह प्राजापत्य कहलाता है। जो नैष्ठिक ब्रह्मचारी जीवनपर्यन्त गुरु का परित्याग न करे, वह बृहन् कहलाता है।
गृहस्थ भी चार प्रकार के होते हैं— वार्ताकवृत्ति, शालीनवृत्ति, यायावर और घोर संन्यासिकवार्ताकवृत्ति गृहस्थ वे हैं, जो कृषि, गोरक्षा (पशुपालन) तथा व्यापार आदि अनिन्दित कर्म करते हुए सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञ आदि का अनुष्ठान करते हुए आत्म-उपासना करते हैं। शालीनवृत्ति गृहस्थ वे होते हैं, जो स्वयं यज्ञ करते हैं, किन्तु दूसरों से नहीं कराते। स्वयं अध्ययन करते हैं, किन्तु दूसरों को नहीं पढ़ाते। दान देते हैं, परन्तु स्वयं दूसरों से ग्रहण नहीं करते। इस प्रकार वे सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञ आदि करते हुए आत्म-उपासना में लगे रहते हैं। यायावर गृहस्थ वे होते हैं, जो स्वयं यज्ञ करते हैं और दूसरों से भी कराते हैं। स्वयं अध्ययन करते हैं तथा दूसरों को भी पढ़ाते हैं। दान देते भी हैं और ग्रहण भी करते हैं। इस प्रकार वे सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञ आदि करते हुए आत्म-साधना करते हैं। घोर संन्यासिक गृहस्थ वे हैं, जो पवित्र जल स्वयं लाकर अपने कार्य करते हैं तथा उच्छवृत्ति (खेत से फसल उठाने के बाद गिरे हुए अन्न को बीनकर जीविका चलाना) अपनाकर जीवन-निर्वाह करते हुए तपश्चर्या में निरत रहते हैं। वे सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञ आदि करते हुए आत्म-साधना करते हैं।
वानप्रस्थ भी चार प्रकार के होते हैं— वैखानस, उदुम्बर, बालखिल्य और फेनपवैखानस वानप्रस्थ वे हैं, जो स्वतः उत्पन्न तथा पकी हुई ओषधियों और वनस्पतियों, जिन्हें ग्रामीणों द्वारा त्याग दिया जाता है, उनसे अग्नि-परिचरण करके पञ्चमहायज्ञ सम्पन्न करते हुए आत्म-साधना करते हैं। उदुम्बर वानप्रस्थ वे हैं, जो प्रातःकाल उठकर जिस दिशा में सर्वप्रथम दृष्टि पड़ती है, उसी दिशा में जाकर गूलर, बेर, नोवार तथा साँवाँ से अग्निहोत्र करके पञ्चमहायज्ञ सम्पन्न करते हुए आत्म-साधना करते हैं। बालखिल्य वानप्रस्थ वे हैं, जो जटा धारण करते हैं तथा चीर, चर्म (मृगचर्म आदि) और वृक्षों की छाल से बने वस्त्र पहनते हैं। वे (चार मास तक पुष्प-फल आदि ग्रहण करने के पश्चात्) कार्तिकी पूर्णिमा के दिन (संचित) पुष्प-फल आदि का परित्याग कर देते हैं तथा (अगले) शेष आठ मास अपनी जीविका (स्वयं उपार्जित साधनों से) चलाते हुए अग्नि-परिचरण करते हैं और पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान करते हुए आत्म-साधना में निरत रहते हैं। फेनप वानप्रस्थ वे हैं, जो विक्षिप्त के समान रहते हुए जीर्ण पत्तों तथा फलों का सेवन करते हैं। जहाँ कहीं भी स्थान मिल जाए, वहीं निवास करते हुए अग्नि-परिचरण करते हैं तथा पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान करते हुए आत्म-साधना करते हैं।
परिव्राजक (संन्यासी) भी चार प्रकार के होते हैं— कुटीचर (या कुटीचक), बहूदक, हंस और परमहंस। इनमें कुटीचर वे होते हैं, जो अपने पुत्र आदि के घरों से भिक्षाचरण करते हुए आत्म-साधना (आत्म-चिन्तन) करते हैं। बहूदक वे हैं, जो त्रिदण्ड, कमण्डलु, शिक्यपक्ष (रस्सी से बुना हुआ सर्सीका अथवा झोला), पवित्र जलपात्र, पादुका, आसन, शिखा, यज्ञोपवीत, कौपीन तथा कषाय (भगवा) वेष धारण करते हुए सच्चरित्र ब्राह्मणों के घरों में भिक्षाचरण करते हैं और आत्मतत्त्व का चिन्तन करते हैं। हंस वे हैं, जो एक दण्ड धारण करते हैं, शिखारहित होते हुए भी यज्ञोपवीत धारण करते हैं तथा हाथ में शिक्य (सींका) और कमण्डलु रखते हैं। वे ग्राम में केवल एक रात्रि तथा नगर और तीर्थ में पाँच रात्रि विश्राम करते हैं। वे एकरात्रि, द्विरात्रि, कृच्छ, चान्द्रायण आदि व्रतों का पालन करते हुए आत्मतत्त्व का चिन्तन करते हैं। परमहंस वे हैं, जो दण्ड धारण नहीं करते। वे मुण्डित रहते हुए कन्था और कौपीन धारण करते हैं। वे अव्यक्त लिङ्ग (अर्थात् अप्रकट चिह्न) वाले तथा अव्यक्त आचरण (गुप्त आचरण, अर्थात् धीर-शान्त रहने वाले) होते हैं। वे स्वयं अनुन्मत्त होते हुए भी उन्मत्त के समान व्यवहार करते हैं। वे त्रिदण्ड, कमण्डलु, शिक्यपक्ष (छीका), पवित्र जलपात्र, पादुका, आसन, शिखा तथा यज्ञोपवीत आदि का त्याग कर देते हैं। वे शून्यगृह (निर्जन घर) अथवा देवालय में निवास करते हैं। उनके लिए धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य आदि का कोई भेद नहीं होता। वे सब कुछ सहन करने वाले, समदर्शी तथा मिट्टी के ढेले, पत्थर और स्वर्ण को समान समझने वाले होते हैं। वे यथालब्ध-सन्तोषी होते हैं तथा चारों वर्णों से भिक्षा प्राप्त करते हुए आत्मा को बन्धन से मुक्त करने तथा मोक्ष की प्राप्ति का उपाय करते हैं।
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