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आश्रम • अध्याय 1 • श्लोक 3
वानप्रस्था अपि चतुर्विधा भवन्ति वैखानसा उदुम्बरा बालखिल्याः फेनपाश्चेति । तत्र वैखानसा अकृष्टपन्यौषधिवनस्पतिभिर्गामबहिष्कृताभिरग्निपरिचरणं कृत्वा पञ्चमहायज्ञ क्रियां निर्वर्तयन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। उदुम्बराः प्रातरुत्थाय यां दिशमभिप्रेक्षन्ते तदाहृतोदुम्बरबदरनी- वारश्यामाकैरग्निपरिचरणं कृत्वा पञ्चमहायज्ञक्रियां निर्वर्तयन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। बालखिल्या जटाधराश्वीरचर्मवल्कलपरिवृताः कार्तिक्यां पौर्णमास्यां पुष्पफलमुत्सृजन्तः शेषानष्टौ मासान् वृत्त्युपार्जनं कृत्वाऽग्निपरिचरणं कृत्वा पञ्चमहायज्ञक्रियां निर्वर्तयन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते । फेनपा उन्मत्तकाः शीर्णपर्णफलभोजिनो यत्र यत्र वसन्तोऽग्निपरिचरणं कृत्वा पञ्चमहायज्ञक्रियां निर्वर्तयन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते ।
वानप्रस्थ भी चार प्रकार के होते हैं— वैखानस, उदुम्बर, बालखिल्य और फेनपवैखानस वानप्रस्थ वे हैं, जो स्वतः उत्पन्न तथा पकी हुई ओषधियों और वनस्पतियों, जिन्हें ग्रामीणों द्वारा त्याग दिया जाता है, उनसे अग्नि-परिचरण करके पञ्चमहायज्ञ सम्पन्न करते हुए आत्म-साधना करते हैं। उदुम्बर वानप्रस्थ वे हैं, जो प्रातःकाल उठकर जिस दिशा में सर्वप्रथम दृष्टि पड़ती है, उसी दिशा में जाकर गूलर, बेर, नोवार तथा साँवाँ से अग्निहोत्र करके पञ्चमहायज्ञ सम्पन्न करते हुए आत्म-साधना करते हैं। बालखिल्य वानप्रस्थ वे हैं, जो जटा धारण करते हैं तथा चीर, चर्म (मृगचर्म आदि) और वृक्षों की छाल से बने वस्त्र पहनते हैं। वे (चार मास तक पुष्प-फल आदि ग्रहण करने के पश्चात्) कार्तिकी पूर्णिमा के दिन (संचित) पुष्प-फल आदि का परित्याग कर देते हैं तथा (अगले) शेष आठ मास अपनी जीविका (स्वयं उपार्जित साधनों से) चलाते हुए अग्नि-परिचरण करते हैं और पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान करते हुए आत्म-साधना में निरत रहते हैं। फेनप वानप्रस्थ वे हैं, जो विक्षिप्त के समान रहते हुए जीर्ण पत्तों तथा फलों का सेवन करते हैं। जहाँ कहीं भी स्थान मिल जाए, वहीं निवास करते हुए अग्नि-परिचरण करते हैं तथा पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान करते हुए आत्म-साधना करते हैं।
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