गृहस्थ भी चार प्रकार के होते हैं— वार्ताकवृत्ति, शालीनवृत्ति, यायावर और घोर संन्यासिक।
वार्ताकवृत्ति गृहस्थ वे हैं, जो कृषि, गोरक्षा(पशुपालन) तथा व्यापार आदि अनिन्दित कर्म करते हुए सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञ आदि का अनुष्ठान करते हुए आत्म-उपासना करते हैं।
शालीनवृत्ति गृहस्थ वे होते हैं, जो स्वयं यज्ञ करते हैं, किन्तु दूसरों से नहीं कराते। स्वयं अध्ययन करते हैं, किन्तु दूसरों को नहीं पढ़ाते। दान देते हैं, परन्तु स्वयं दूसरों से ग्रहण नहीं करते। इस प्रकार वे सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञ आदि करते हुए आत्म-उपासना में लगे रहते हैं।
यायावर गृहस्थ वे होते हैं, जो स्वयं यज्ञ करते हैं और दूसरों से भी कराते हैं। स्वयं अध्ययन करते हैं तथा दूसरों को भी पढ़ाते हैं। दान देते भी हैं और ग्रहण भी करते हैं। इस प्रकार वे सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञ आदि करते हुए आत्म-साधना करते हैं।
घोर संन्यासिक गृहस्थ वे हैं, जो पवित्र जल स्वयं लाकर अपने कार्य करते हैं तथा उच्छवृत्ति(खेत से फसल उठाने के बाद गिरे हुए अन्न को बीनकर जीविका चलाना) अपनाकर जीवन-निर्वाह करते हुए तपश्चर्या में निरत रहते हैं। वे सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञ आदि करते हुए आत्म-साधना करते हैं।
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