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आश्रम • अध्याय 1 • श्लोक 2
गृहस्था अपि चतुर्विधा भवन्ति वार्ताकवृत्तयः शालीनवृत्तयो यायावरा घोरसंन्या - सिकाश्चेति । तत्र वार्ताकवृत्तयः कृषिगोरक्षवाणिज्यमगर्हितमुपयुञ्जानाः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। शालीनवृत्तयो यजन्तो न याजयन्तोऽधीयाना नाध्यापयन्तो ददतो न प्रतिगृह्णन्तः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। यायावरा यजन्तो याजयन्तोऽधीयाना अध्यापयन्तो ददतः प्रतिगृह्वन्तः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। घोरसंन्यासिका उद्भुतपरिपूताभिरद्भिः कार्य कुर्वन्तः प्रतिदिवसमाहतोज्छवृत्ति - मुपयुञ्जानाः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते ॥
गृहस्थ भी चार प्रकार के होते हैं - वार्ताकवृत्ति, शालीनवृत्ति, यायावर और घोर संन्यासिक। वार्ताकवृत्ति गृहस्थ वे हैं, जो कृषि, गोरक्षा (पशुपालन) व व्यापार आदि अनिन्दित कर्म करते हुए सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञादि करते हुए आत्म-उपासना करते हैं। शालीनवृत्ति गृहस्थ वे होते हैं, जो स्वयं यज्ञ करते हैं। किन्तु अन्यों को कराते नहीं हैं। स्वयं अध्ययन करते हैं; किन्तु औरों को पढ़ाते नहीं हैं। दान देते तो हैं; किन्तु दूसरों से स्वयं नहीं लेते। इस प्रकार सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञादि करते हुए आत्म-उपासना करते हैं। यायावर गृहस्थ वे होते हैं, जो यज्ञ करते हैं और दूसरों को भी कराते हैं। स्वयं अध्ययन करते हैं तथा दूसरों को भी कराते हैं। दान देते हैं तथा लेते भी हैं। इस प्रकार सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञादि करते हुए आत्म-साधना करते हैं। घोर संन्यासिक गृहस्थ वे हैं, जो पवित्र जल स्वयं लाकर कार्य करते हुए उज्छवृत्ति (खेत से फसल उठाने के बाद गिरे हुए अन्न को बीन कर जीविका चलाना) अपना कर जीवन निर्वाह करते हुए तपश्वर्या में निरत रहकर सौ वर्ष (पूर्ण आयु) तक यज्ञादि करते हुए आत्म-साधना करते हैं ।
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