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आश्रम • अध्याय 1 • श्लोक 4
परिव्राजका अपि चतुर्विधा भवन्ति कुटीचरा बहूदका हंसाः परमहंसाश्चेति । तत्र कुटीचराः स्वपुत्रगृहेषु भिक्षाचर्यं चरन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। बहूदकास्त्रिदण्डकमण्डलु- शिक्यपक्षजलपवित्रपात्रपादुकासनशिखायज्ञोपवीतकौपीनकाषायवेषधारिणः साधुवृत्तेषु ब्राह्मणकुलेषु भैक्षाचर्य चरन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। हंसा एकदण्डधराः शिखावर्जिता यज्ञोपवीतधारिणः शिक्यकमण्डलुहस्ता ग्रामैकरात्रवासिनो नगरे तीर्थेषु पञ्चरात्रं वसन्त एकरात्रद्विरात्रकृच्छ्रचान्द्रायणादि चरन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते। परमहंसा नदण्डधरा मुण्डाः कन्याकौपीनवाससोऽव्यक्तलिङ्गा अव्यक्ताचारा अनुन्मत्ता उन्मत्तवदाचरन्तस्त्रिदण्डकमण्डलु शिक्यपक्षजलपवित्रपात्रपादुकासनशिखायज्ञोपवीतानां त्यागिनः शून्यागारदेवगृहवासिनो न तेषां धर्मो नाधर्मो न चानृतं सर्वंसहाः सर्वसमाः समलोष्टाश्मकाञ्चना यथोपपन्नचातुर्वर्ण्य- भैक्षाचर्यं चरन्त आत्मानं मोक्षयन्त आत्मानं मोक्षयन्त इति ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः.....इति शान्तिः ॥ ॥ इति आश्रमोपनिषत्समाप्ता ॥
परिव्राजक (संन्यासी) भी चार प्रकार के होते हैं - कुटीचर (या कुटीचक), बहूदक, हंस और परमहंस। इनमें कुटीचर वे होते हैं, जो अपने पुत्र आदि के गृहों से भिक्षाचरण करते हुए आत्म-साधना करते हैं (आत्म चिन्तन करते हैं)। बहूदक वे हैं, जो त्रिदण्ड, कमण्डलु, शिक्यपक्ष (रस्सी से बुना हुआ सर्सीका अथवा झोला) पवित्र जलपात्र, पादुका, आसन, शिखा, यज्ञोपवीत, कौपीन तथा कषाय (भगवा) वेष धारण करते हुए सच्चरित्र ब्राह्मणों के घरों में भिक्षाचरण करते हुए आत्मतत्त्व का चिन्तन करते हैं। हंस वे हैं, जो एक दण्ड धारण करते हैं, शिखारहित यज्ञोपवीतधारी हाथ में शिक्य (सींका) और कमण्डलु धारण करने वाले हैं। वे ग्राम में केवल एक रात्रि तथा नगर और तीर्थ में पाँच रात्रि विश्राम करते हैं। वे एक रात्रि, दो रात्रि कृच्छ चान्द्रायण आदि व्रत करते हुए आत्म-तत्त्व का चिन्तन करते हैं। परमहंस वे हैं, जो दण्ड धारण नहीं करते, मुण्डित रहते हुए कन्या और कौपीन धारण करते हैं। वे अव्यक्त लिङ्ग (अर्थात् अप्रकट चिह्न) वाले, अव्यक्त (गुप्त) आचरण वाले अर्थात् धीर-शान्त रहने वाले होते हैं, जो अनुन्मत्त होते हुए भी उन्मत्त की तरह व्यवहार करते हैं। वे त्रिदण्ड, कमण्डलु, शिक्यपक्ष (छीका), पवित्र जलपात्र, पादुका, आसन, शिखा और यज्ञोपवीत आदि का त्याग कर देते हैं। वे शून्यगृह (निर्जन घर) अथवा देवालय में वास करते हैं। उनके लिए धर्म- अधर्म, सत्य-असत्य कुछ नहीं होता। वे सब कुछ सहन करने वाले, समदर्शी और मिट्टी के ढेले, पत्थर और स्वर्ण को समान समझने वाले होते हैं। वे यथालब्ध सन्तोषी तथा चारों वर्णों से भिक्षा प्राप्त करते हुए आत्मा को बंधन से मुक्त करते हैं, आत्मा के मोक्ष हेतु उपाय करते हैं।
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