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अध्याय 1 — प्रथमोऽध्यायः

ऐतरेय
4 श्लोक • केवल अनुवाद
प्रारम्भ में केवल आत्मा (परम चेतना) ही था, उसके अलावा कुछ भी नहीं था—कुछ भी अस्तित्व में नहीं था। तब उसने सोचा— “मैं इन लोकों (सृष्टि) की रचना करूँ।”
उस (आत्मा) ने इन लोकों की रचना की— अम्भः → स्वर्ग के ऊपर का जलमय लोक मरीचि → आकाश (अंतरिक्ष, जहाँ प्रकाश फैलता है) मर (मर्त्य लोक) → पृथ्वी (जहाँ मनुष्य रहते हैं)
उस (आत्मा) ने सोचा— “ये जो लोक मैंने बनाए हैं, इनके रक्षक (लोकपाल) भी बनाऊँ।” तब उसने जल (आप) से ही एक पुरुष (जीव/मानव रूप) को निकालकर उसे आकार दिया (रूप में स्थापित किया)।
उस (पुरुष) को तपाया (सक्रिय किया)। तप के प्रभाव से उसके अंग प्रकट होने लगे— मुख (मुँह) खुला → उससे वाणी उत्पन्न हुई, और वाणी से अग्नि नासिका (नाक) खुली → उससे प्राण (श्वास), और उससे वायु नेत्र (आँखें) खुलीं → उनसे दृष्टि, और उससे सूर्य कान खुले → उनसे श्रवण शक्ति, और उससे दिशाएँ त्वचा (चर्म) प्रकट हुई → उससे बाल, और उनसे वनस्पतियाँ हृदय प्रकट हुआ → उससे मन, और मन से चन्द्रमा नाभि प्रकट हुई → उससे अपान वायु, और उससे मृत्यु
Krishjan
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