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ऐतरेय • अध्याय 1 • श्लोक 3
स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति॥ सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत्‌ ॥
उस (आत्मा) ने सोचा— “ये जो लोक मैंने बनाए हैं, इनके रक्षक (लोकपाल) भी बनाऊँ।” तब उसने जल (आप) से ही एक पुरुष (जीव/मानव रूप) को निकालकर उसे आकार दिया (रूप में स्थापित किया)।
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