Krishjan
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अध्याय 1 — प्रथम अध्याय
आत्मबोध
9 श्लोक • केवल अनुवाद
हे परमात्मन्। मेरी वाणी मन में स्थित हो, मन वाणी में प्रतिष्ठित हो।
(हे परमात्मन्!)
आप मेरे समक्ष प्रकट हों। मेरे लिए वेद का ज्ञान लाएँ
(प्रकट करें)
। मैं पूर्वश्रुत ज्ञान को विस्मृत न करूँ। इस स्वाध्यायशील प्रवृत्ति से मैं दिन और रात्रियों को एक कर दूँ
(मेरा स्वाध्याय सतत चलता रहे)
। मैं सदैव ऋत और सत्य बोलूँगा। ब्रह्म मेरी रक्षा करे। वह
(ब्रह्म)
वक्ता
(आचार्य)
की रक्षा करे। त्रिविध ताप शान्त हों।
स्वयं अपने आप में आनन्द स्वरूप विराट् ब्रह्म पुरुष '
अकार उकार-मकार
' से युक्त यह तीन अक्षरों वाला ॐकार रूप प्रणव का स्वरूप है। इसका जप करने से योगीजन सांसारिक बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। शंख, चक्र एवं गदा को धारण करने वाले परमात्मा स्वरूप नारायण के लिए नमस्कार है। '
ॐ नमो नारायणाय
' नामक इस मन्त्र की उपासना करने वाला मनुष्य वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करता है।
जो यह हृदय रूपी कमल है, वही ब्राह्मपुर है। केवल अकेला वही क्षेत्र विद्युत् अथवा दीपक के सदृश प्रकाशमान होता है।
(आध्यात्मिक दृष्टि से भी हृदय क्षेत्र में दिव्य प्रकाश का बोध होता है तथा शरीर विज्ञान के अनुसार 'पेसमेकर' में भी हृदय को संचालित करने वाले स्पन्दन स्वतः ही उभरते रहते हैं। इन्हीं काय विद्युत् स्पन्दनों का अंकन है. सी. जी. आदि यन्त्र करते हैं।)
देवकी पुत्र भगवान् कृष्ण ब्राह्मणों का हित चाहने वाले हैं,
(थे)
मधुसूदन ब्राह्मणों का सदा हित करने बाले हैं, कमल के सदृश नेत्र वाले भगवान् विष्णु ब्राह्मणों के शुभचिन्तक हैं तथा वे अविनाशी भगवान् अच्युत ब्राह्मणों के प्रिय हैं।
समस्त भूत-प्राणियों में स्थित रहने वाले एक मात्र भगवान् नारायण ही कारण रूप विराट् पुरुष हैं, वे स्वयं ही कारणरहित हैं, परब्रह्म हैं, वे प्रणवरूप ॐकार स्वरूप हैं।
इस प्रकार से भगवान् विष्णु का चिन्तन करने वाला शोक और मोह से मुक्त होकर कभी भी दु:ख को नहीं प्राप्त होता।
(वह)
द्वैत
(भेद बुद्धि वाला)
, अद्वैत
(भेद रहित बुद्धिवाला)
हो जाता है। मृत्यु से वह भयरहित हो जाता है। जो भी व्यक्ति इस ब्रह्म में भेद देखता है, वह बार-बार मृत्यु को प्राप्त करता है।
हृदय कमल के बीच में जो सर्वरूप
(चेतन)
है, वह प्रज्ञान में प्रतिष्ठित है। यह लोक प्रज्ञा रूप नेत्र से युक्त है या प्रज्ञा से ही गतिशील है।
(सर्वत्र)
प्रज्ञा ने प्रतिष्ठा प्राप्त की है, अविनाशी ब्रह्म प्रज्ञान स्वरूप है।
वह श्रेष्ठ ज्ञानी इस उत्कृष्ट ज्ञान-सम्पन्न आत्मा के रूप में इस लोक से ऊर्ध्वगमन करके उच्च स्थान पर जाकर स्वर्गलोक में सर्वकामनाओं को प्राप्त करके अमर हो गया।
जहाँ पर नित्य ज्योति स्थिर रहती है, जिस लोक में सभी प्राणियों की आत्मा के रूप में सेवा होती है, ऐसे उस अमर लोक में आप मुझे स्थान प्रदान करें। इस अविनाशी अमरलोक में कुछ काल के लिए भी रहने वाला जीवन्मुक्त होकर और अमृतत्व प्राप्त करके विदेह
(मुक्त)
होकर कैवल्य पद को प्राप्त कर लेता है, उस ॐकार
(स्वरूप आत्मतत्त्व)
को नमस्कार है।
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