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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 6
शोकमोहविनिर्मुक्तो विष्णुं ध्यायन्न सीदति । द्वैताद्वैतमभयं भवति । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥
इस प्रकार से भगवान् विष्णु का चिन्तन करने वाला शोक और मोह से मुक्त होकर कभी भी दु:ख को नहीं प्राप्त होता। (वह) द्वैत (भेद बुद्धि वाला), अद्वैत (भेद रहित बुद्धिवाला) हो जाता है। मृत्यु से वह भयरहित हो जाता है। जो भी व्यक्ति इस ब्रह्म में भेद देखता है, वह बार-बार मृत्यु को प्राप्त करता है।
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