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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 9
यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिंल्लोकेऽभ्यर्हितम् । तस्मिन्मां देहि स्वमानमृते लोके अक्षते अच्युते लोके अक्षते अमृतत्वं च गच्छत्यों नमः ॥
जहाँ पर नित्य ज्योति स्थिर रहती है, जिस लोक में सभी प्राणियों की आत्मा के रूप में सेवा होती है, ऐसे उस अमर लोक में आप मुझे स्थान प्रदान करें। इस अविनाशी अमरलोक में कुछ काल के लिए भी रहने वाला जीवन्मुक्त होकर और अमृतत्व प्राप्त करके विदेह (मुक्त) होकर कैवल्य पद को प्राप्त कर लेता है, उस ॐकार (स्वरूप आत्मतत्त्व) को नमस्कार है।
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