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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 2
ॐ प्रत्यगानन्दं ब्रह्मपुरुषं प्रणवस्वरूपं अकार उकारो मकार इति त्र्यक्षरं प्रणवं तदेतदोमिति । यमुक्त्वा मुच्यते योगी जन्मसंसारवन्धनात् । ॐ नमो नारायणाय शङ्खचक्रगदाधराय तस्यात् ॐ नमो नारायणायेति मंत्रोपासको वैकुण्ठभुवनं गमिष्यति ॥
स्वयं अपने आप में आनन्द स्वरूप विराट् ब्रह्म पुरुष 'अकार उकार-मकार' से युक्त यह तीन अक्षरों वाला ॐकार रूप प्रणव का स्वरूप है। इसका जप करने से योगीजन सांसारिक बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। शंख, चक्र एवं गदा को धारण करने वाले परमात्मा स्वरूप नारायण के लिए नमस्कार है। 'ॐ नमो नारायणाय' नामक इस मन्त्र की उपासना करने वाला मनुष्य वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करता है।
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