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अध्याय 1 — त्रिपुरा उपनिषद

त्रिपुरा
18 श्लोक • केवल अनुवाद
हे सच्चिदानंद परमात्मन। मेरी वाणी मन में प्रतिष्ठित हो जाए। मेरा मन मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो जाए। हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर! मेरे सामने आप प्रकट हो जाएँ। हे मन और वाणी! तुम दोनों मेरे लिए वेद विषयक ज्ञान को लानेवाले बनो। मेरा सुना हुआ ज्ञान कभी मेरा त्याग न करे। मैं अपनी वाणी से सदा ऐसे शब्दों का उच्चारण करूंगा, जो सर्वथा उत्तम हों तथा सर्वदा सत्य ही बोलूँगा। वह ब्रह्म मेरी रक्षा करे, मेरे आचार्य की रक्षा करे। भगवान् शांति स्वरुप हैं अतः वह मेरे अधिभौतिक, अधिदैविक और अध्यात्मिक तीनो प्रकार के विघ्नों को सर्वथा शान्त करें ।
तीन पुर, तीन पथ एवं इस (श्री चक्र) में सन्निविष्ट अकथादि अक्षर - इन सभी से अधिष्ठित यह (शक्ति) सबको समान दृष्टि से देखने वाली जो अजर, प्राचीन चैतन्य शक्ति है, वह अपनी महिमा से अत्यधिक श्रेष्ठ है।
वह चैतन्य शक्ति नव योनि, नवचक्र, नवयोग, नवयोगिनी, नवचक्रों की आधार शक्तियों, सुखकारी नवभद्राओं तथा महिमाशालिनी नव मुद्राओं के रूप में प्रकाशित हो रही है।
नवभद्रा आदिरूप में, उन्नीस तत्त्व समूह रूप में, चालीस शक्तियों के रूप में तथा तीन समिधा के रूप में अपनी सन्तानों के लिए कल्याण कामना करने वाली माता के समान (ब्रह्मपद प्राप्ति की कामना वाले) मुझमें प्रवेश करें अर्थात् मेरे अन्तःकरण में प्रविष्ट हों।
ऊर्ध्व (ऊपर) की ओर प्रज्वलित होने वाली और प्रकाशित होने वाली ज्योति सर्वप्रथम अनुभव में आती है। इसके विपरीत तमोगुण तिरश्चीन (तिरछी गति वाला) और अजर है, उससे रजोगुण उत्पन्न हुआ। यह ज्योति आनन्द और प्रसन्नता देने वाली है तथा इन्दु के (चन्द्रवत् शीतल) गुणों से विभूषित करती है।
जो तीन रेखाएँ हैं, चार सदन हैं, तीन भू (स्थल) हैं, तीन विष्टप, तीन गुण और तीन-तीन प्रकार (भेद) हैं। ये सभी त्रिक पूर्णता प्रदान करने के साधन स्वरूप हैं। मन्त्र में (श्री चक्र में) कामना (पूर्ण करने वाली) शक्ति से मदन (कामना के अधिष्ठाता देवता) जय शील हो।
उनके परिवार के आवरण देवता की संख्या पन्द्रह है, जो क्रमशः मदन्तिका, मानिनी, मंगला, सुभगा, सुन्दरी, सिद्धिमत्ता, लज्जा, मति, तुष्टि, इष्टा, पुष्टा, लक्ष्मी, उमा, ललिता एवं लालपन्ती हैं।
साधक इनको जानकर इनके अमृत गुणों से प्रसन्नता का अनुभव करते हुए, स्व पीठ (श्री चक्रपीठ) को दुग्ध आदि से तृप्त करते हुए महान् स्वर्गलोक में निवास करते हैं और त्रैपुर परमधाम में पहुँच कर अपने को कृतकृत्य अनुभव करते हैं।
आदिमूल विद्या का स्वरूप इस प्रकार है - यह काम, योनि, काम-कला, वज्रपाणि, गुहा, हसा, मातरिश्वा, अभ्र, इन्द्र, पुनः गुहा, सकला और माया आदि से यह विशिष्टरूपा यह विद्या, प्रवर्धमान हुई है।
आदि विद्या के छठे वर्ण (ह-शिवबीज), सातवें वर्ण (स-शक्तिबीज) और वह्नि सारथि (ककामेश-बीज) इसके मूलत्रिक (ह, स,क) का जप करते हुए कथ्य रूप, कवि (क्रान्तदर्शी-भूत, भविष्यत् और वर्तमान को जानने वाला-त्रिकालज्ञ) सदृश कामेश्वर की स्तुति करते हुए अमृतत्व को प्राप्त करते हैं।
(वह देवी) पुर, हन्त्रीमुख (ह-स-क), विश्वमातारूप, रवि-रेखा (आदित्य मंडल रूप), स्वर मध्य ('ई' 'ओ' रूप) आदि रूपों में विद्यमान बृहत्तिथि (निमेष से लेकर कल्पान्त तक) तथा पंचदशादि (पन्द्रह तिथियाँ, वार नक्षत्रादि) नित्य (देवता भाव को प्राप्त) सषोडशिक (सोलहवीं तिथि पूर्णिमा सहित) पुर मध्य (स्व अविद्या पर आधारित) रूपों को धारण करती है।
रवि, चन्द्र आदि के मण्डल से आविर्भूत सर्वांग सुन्दरी जिसका एक स्तनबिम्ब एवं मुख नीचे की ओर है, के देहत्रय (स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर) रूपी गुहा में अवस्थित परमेश्वर की कला-'कामकला' का ध्यान करके योगी अपनी समस्त कामनाओं को पूर्ण करके स्वेच्छानुसार 'काममय' हो जाता है, पर काम्यफल जन्म आदि का कारण होता है, इसलिए उच्च वर्ण वाले मुमुक्षु को सकाम उपासना नहीं करनी चाहिए।
इसी प्रकार हीन वर्ण वाले विधिवत् तैयार किये गये अपने भोज्य पदार्थ को आत्मीय भोग बुद्धि का परित्याग करके सर्वप्रथम महादेवी को समर्पित करके प्रसाद रूप में ग्रहण कर पुण्य कर्मों के द्वारा श्रेष्ठ कर्मों की सिद्धि प्राप्त करते हैं।
जो मनुष्य इस काम्य मार्ग में निरत रहते हैं, उन कामीजनों को सरस्वती, लक्ष्मी, आदिशक्ति गौरीब्रह्म विद्या रूप धारण करके भलीप्रकार बाँधकर संसार के महावर्त (भंवर) में डाल देती हैं तथा पंच बाण (पंचेन्द्रियों) और धनुष से विद्ध कर देती हैं, उनका उद्धार कभी नहीं करतीं।
छः ऐश्वर्यो (समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य) से सम्पन्न चित् शक्ति, भगवान् काम और ईश (कामेश्वर) दोनों (चित् शक्ति सामान्यात्मा की दृष्टि से) सम प्रधान, समान सत्त्व से युक्त, समान ओज से युक्त दयार्द्र होकर, निष्काम उपासक को ब्रह्मपद प्रदान कर देते हैं। उन दोनों ('शिव-शक्ति' या 'कामईश) के मध्य तीनों शरीरों से विलक्षण अजरा जरारहित यह विश्वमाता - श्री शक्ति स्थित रहती है।
उपासक की निष्काम भावना से भावित ज्ञान, विज्ञान और सम्यक् ज्ञान रूपी हवि द्वारा भली प्रकार संतृप्त हुई आवरण और विक्षेप को, गलाकर नष्ट कर देती है। इस प्रकार उपासक संसार से अमनस्क होकर सम्पूर्ण जगत् के विधाता, पालक एवं संहारक अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, महेश बनकर विश्वरूपता को प्राप्त कर लेता है।
यह ऋग्यजु, साम, अथर्व तथा अन्य विद्याएँ पुराण, न्याय, मीमांसा आदि १४ विद्याएँ, जिसकी अक्षय ज्ञानस्वरूप परम सर्वोत्कृष्ट वाणीरूप स्तोत्रों से स्तुतियाँ करती हैं। यही त्रिपुरा नाम की महोपनिषद् है। 'ॐ ह्रीं' - यही चित् और शक्ति तत्त्व है। यही चैतन्य शक्ति तत्त्व है।
हे सच्चिदानंद परमात्मन। मेरी वाणी मन में प्रतिष्ठित हो जाए। मेरा मन मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो जाए। हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर। मेरे सामने आप प्रकट हो जाएँ। हे मन और वाणी! तुम दोनों मेरे लिए वेद विषयक ज्ञान को लानेवाले बनो। मेरा सुना हुआ ज्ञान कभी मेरा त्याग न करे। मैं अपनी वाणी से सदा ऐसे शब्दों का उच्चारण करूंगा, जो सर्वथा उत्तम हों तथा सर्वदा सत्य ही बोलूँगा। वह ब्रह्म मेरी रक्षा करे, मेरे आचार्य की रक्षा करे। ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ भगवान् शांति स्वरुप हैं अतः वह मेरे अधिभौतिक, अधिदैविक और अध्यात्मिक तीनो प्रकार के विघ्नों को सर्वथा शान्त करें।
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