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अध्याय 1 — स्वसंवेद्य उपनिषद्
स्वसंवेद्य
4 श्लोक • केवल अनुवाद
ॐ
प्राणिस्वरूप
बुलबुलों
(पानी के बुलबुलों)
का
निरञ्जन
और
अव्यक्त अमृत-सागररूप परब्रह्म
में विलीन हो जाना ही प्रकट एवं सत्य स्थिति है। यह अवश्य ही होती है।
ब्रह्मलीन
हो जाने वालों का पुनरागमन नहीं होता। उनकी स्थिति
मृत्तिकापिण्ड
में
कुम्भ
की भाँति तथा
धागों
में
कपड़े
की भाँति हो जाती है। वस्तुतः वह न
उपादान
है, न
उपादेय
और न ही
निमित्त
है। वह न
विद्या
है, न
पुराण
, न
वेद
, न
इतिहास
। वह न
जगत्
है, न
ब्रह्मा
, न
विष्णु
, न
रुद्र
, न
ईश्वर
, न
बिन्दु
और न ही
कला
है।
आदि
,
मध्य
और
अन्त
—किसी भी अवस्था में उन्हें
(प्राणियों को)
यथार्थ
ज्ञान
नहीं होता, क्योंकि वे
आगम
,
पुराण
,
इतिहास
एवं
धर्मशास्त्रों
में अभिमान धारण करने वाले होते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि वे
जीव
मुनि
द्वारा उच्चरित श्रेष्ठ
वचनों
रूपी
बुद्बुदों
द्वारा निर्मित धारणाओं में ही उलझे रहते हैं। वहाँ
(उस सन्दर्भ में)
उन्हीं की प्रामाणिकता स्वीकार की जाती है। वे
अज्ञान
से आवृत रहते हैं। बहुत प्रयत्न करने पर भी वे कुछ ही
ज्ञान
प्राप्त कर पाते हैं। फिर भी यह प्रसिद्ध उक्ति है कि वे सभी
जीव
अज्ञानयुक्त
तथा अत्यन्त
मुग्ध
हैं।
यहाँ उस
अज्ञान
से कोई प्रयोजन नहीं है और उस
यथावस्थित ज्ञान
से भी कोई प्रयोजन नहीं है। जिसका
अस्तित्व
है, उसका है। जिसका
अस्तित्व
नहीं है, उसका नहीं है। ये सभी
काल
,
कर्म
तथा
स्वभाव
पर आधारित हैं।
पुण्य
और
पाप
भी नहीं हैं। अतएव
सुमेरु
(स्वर्ण)
का दाता,
गोदाता
,
गोहन्ता
,
ब्राह्मणहन्ता
,
सुरापायी
,
डाकू
,
चोर
,
गुरु
,
महापापनिष्ठ
तथा
सर्वपापनिष्ठ
—ये सभी एक समान हैं। उनके लिए न
गौ
है, न
ब्राह्मण
, न
शराब पीने वाला
, न
डाकू
, न
चोर
, न
बड़े पाप
हैं और न ही
छोटे पाप
। उनके लिए तो
(उनका)
मत
ही सर्वोपरि है, क्योंकि
मत
में ही उनकी
निष्ठा
है।
मोक्ष
और
नरक
भी उनके लिए कुछ नहीं हैं। यही इस
श्लोक
का अर्थ है।
तत्त्वज्ञान
को
गुहा
(हृदय की गहन अन्तरावस्था)
में स्थित कहा गया है।
अज्ञानी
लोगों द्वारा अपनाए गए
ज्ञानमार्ग
को वे स्वयं श्रेष्ठ मानते हैं, क्योंकि वे उस मार्ग पर
अभिमान
के साथ चलते हैं। वे
पुष्पित वचनों
(आकर्षक एवं लुभावने शब्दों)
से मोहित हो जाते हैं। जिस प्रकार
माता
बच्चे को औषधि खिलाने के लिए उसमें
गुड़
आदि मिलाकर उसे प्रलोभन देती है, उसी प्रकार
अनेक देवताओं की उपासना
,
गुरु-निष्ठा
,
तीर्थ-सेवन
तथा विभिन्न
सत्कर्म
करने वाले भी प्रायः इन कर्मों के पीछे
सद्गति
की कामना रखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि
हम वैदिक हैं
, जबकि अन्य ऐसा नहीं कहते। कुछ अपने को
समस्त शास्त्रों का ज्ञाता
बताते हैं और कुछ अपने को
देव-अनुग्रह
प्राप्त मानते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे
स्वप्न
में अपने
उपास्य देवता
द्वारा बताई गई बातें बता देते हैं
(जैसे चोरी का सामान मिलने आदि का ज्ञान होने का दावा करते हैं)
। कुछ लोग अपने को
देवता
बताते हैं। कुछ कहते हैं कि वे
भगवान् विष्णु
रूपी कमल पर गुंजार करने वाले
भ्रमर
(अर्थात् वैष्णव)
हैं। कुछ लोग
परमभक्ति
के आनन्द में नृत्य करते हैं। कुछ
मूर्खजन
अपने को
परमभक्त
बताते हुए रोते हैं और पतन को प्राप्त होते हैं। जो भी इस प्रकार के हैं, वे प्रायः सभी
अज्ञानी
हैं। जो
ज्ञानी
हैं और जो
तत्त्वज्ञानी
हैं, उनमें परस्पर कौन श्रेष्ठ है?
(अर्थात् कोई नहीं।)
उनके बीच केवल
मत
का भेद दिखाई देता है। यह सर्वमान्य मत है कि जहाँ
ब्रह्मा
,
विष्णु
,
रुद्र
और
ईश्वर
जाते हैं, वहीं
कुत्ते
,
गधे
,
बिल्लियाँ
और
कृमि
भी जाते हैं। यह भी सर्वमान्य है कि
कुत्ते
,
गधे
,
बिल्लियाँ
और
कृमि
न
उत्तम
हैं, न
मध्यम
और न
नीच
; सृष्टि में सभी का अपना-अपना स्थान है। यही इस
श्लोक
का अभिप्राय है।
इसलिए न
'तत्'
शब्द है, न
'किम्'
शब्द है
(अर्थात् न प्रश्न है, न उत्तर)
और न ही अन्य कोई
शब्द
है। न
माता
, न
पिता
, न
बन्धु
, न
पत्नी
, न
पुत्र
, न
मित्र
और न ही अन्य कोई सम्बन्ध है। फिर भी
साधकों
को
आत्मस्वरूप
को जानने की आकांक्षा तथा
जीवन्मुक्ति
की प्राप्ति के लिए
सन्त-सेवा
करनी चाहिए।
स्त्री
,
पुत्र
,
धन
और
गृह
—सब कुछ उन्हें
(सद्गुरु को)
अर्पित कर देना चाहिए, अर्थात् इनके प्रति अपना
मोह
त्याग देना चाहिए।
कर्मद्वैत
नहीं,
भावाद्वैत
का आचरण करना चाहिए।
सर्वात्मभाव
को दृढ़ करना चाहिए। किन्तु
गुरु
के प्रति
द्वैतभाव
अवश्य रखना चाहिए, क्योंकि उनसे बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं है। उन्हीं के द्वारा सम्पूर्ण
जगत्
प्रकाशित होता है, अर्थात्
गुरु
की कृपा से ही सब कुछ जाना जाता है। उनसे बढ़कर और कौन है?
(अर्थात् कोई नहीं।)
जो इस
तत्त्व
को सम्यक् रूप से जान लेता है, वह
जीवन्मुक्त
हो जाता है।
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