तत्त्वज्ञानं गुहायां निविष्टमज्ञानिकृतमार्ग सुष्ठ वदन्ति । ते तत्र साभिमाना वर्तन्ते । पुष्पितवचनेन मोहितास्ते भवन्ति। स यथातुरा भिषग्ग्रहणकाले बाला अपथ्याहितगुडादिना जनन्या वञ्चिता इति नानादेवता गुरुकर्मतीर्थनिष्ठाश्च ते भवन्ति । केचिद्वयं वैदिका इति वदन्ति । नान्येऽस्मध्यम् । केचिद्वयं सर्वशास्त्रज्ञा इति। केचिद्वयं देवानुग्रहवन्तः । केचिद्वयं स्वप्ने उपास्यदेवताभाषिणः। केचिद्वयं देवा इति। केचिद्वयं श्रीमद्रमारमणनलिनभृङ्गा इति। केचित्तु नृत्यन्तु। केचित्तु पूर्खा वयं परमभक्ता इति वदन्तो रुदन्ति पतन्ति च। ये केचनैते ते सर्वेऽप्यज्ञानिनः। ये तु ज्ञानिनो भवन्ति ये तत्त्वज्ञानिनश्च तैस्तेषां को विशेषः । मत एव केषाञ्चित्कैश्चिद्भेदः । मत एव यत्र विरिञ्चिविष्णुरुद्रा ईश्वरश्च गच्छन्ति तत्रैव श्वानो गर्दभाः मार्जाराः कृमयश्च मत एव न श्वानगर्दभौ न मार्जारः न कृमिः नोत्तमाः न मध्यमाः न जघन्याः । तदप्येष श्रोको भवति ॥
तत्त्वज्ञान को गुहा(हृदय की गहन अन्तरावस्था) में स्थित कहा गया है।
अज्ञानी लोगों द्वारा अपनाए गए ज्ञानमार्ग को वे स्वयं श्रेष्ठ मानते हैं, क्योंकि वे उस मार्ग पर अभिमान के साथ चलते हैं।
वे पुष्पित वचनों(आकर्षक एवं लुभावने शब्दों) से मोहित हो जाते हैं।
जिस प्रकार माता बच्चे को औषधि खिलाने के लिए उसमें गुड़ आदि मिलाकर उसे प्रलोभन देती है, उसी प्रकार अनेक देवताओं की उपासना, गुरु-निष्ठा, तीर्थ-सेवन तथा विभिन्न सत्कर्म करने वाले भी प्रायः इन कर्मों के पीछे सद्गति की कामना रखते हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि हम वैदिक हैं, जबकि अन्य ऐसा नहीं कहते। कुछ अपने को समस्त शास्त्रों का ज्ञाता बताते हैं और कुछ अपने को देव-अनुग्रह प्राप्त मानते हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि वे स्वप्न में अपने उपास्य देवता द्वारा बताई गई बातें बता देते हैं (जैसे चोरी का सामान मिलने आदि का ज्ञान होने का दावा करते हैं)।
कुछ लोग अपने को देवता बताते हैं। कुछ कहते हैं कि वे भगवान् विष्णु रूपी कमल पर गुंजार करने वाले भ्रमर(अर्थात् वैष्णव) हैं।
कुछ लोग परमभक्ति के आनन्द में नृत्य करते हैं।
कुछ मूर्खजन अपने को परमभक्त बताते हुए रोते हैं और पतन को प्राप्त होते हैं।
जो भी इस प्रकार के हैं, वे प्रायः सभी अज्ञानी हैं।
जो ज्ञानी हैं और जो तत्त्वज्ञानी हैं, उनमें परस्पर कौन श्रेष्ठ है? (अर्थात् कोई नहीं।)
उनके बीच केवल मत का भेद दिखाई देता है।
यह सर्वमान्य मत है कि जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर जाते हैं, वहीं कुत्ते, गधे, बिल्लियाँ और कृमि भी जाते हैं।
यह भी सर्वमान्य है कि कुत्ते, गधे, बिल्लियाँ और कृमि न उत्तम हैं, न मध्यम और न नीच; सृष्टि में सभी का अपना-अपना स्थान है।
यही इस श्लोक का अभिप्राय है।
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