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स्वसंवेद्य • अध्याय 1 • श्लोक 4
न तच्छब्दः न किंशब्दः न सर्वे शब्दाः न माता नो पिता न बन्धुः न भार्या न पुत्त्रो न मित्वं नो सर्वे तथापि साधकैरात्मस्वरूपं वेदितुमिच्छद्भिर्जीवन्मुमुक्षुभिः सन्तः सेव्याः । भार्या पुत्त्रो गृहं धनं सर्वं तेभ्यो देयम्। कर्माद्वैतं न कार्यं भावाद्वैतं तु कार्य। निश्चयेन सर्वाद्वैतं कर्तव्यम् । गुरौ द्वैतमवश्यं कार्यम्। यतो न तस्मादन्यत्। येन सर्वमिदं प्रकाशितम्। कोऽन्यः तस्मात्परः । स जीवन्मुक्तो भवति स जीवन्मुक्तो भवति। य एवं वेद। य एवं वेद ॥
इसलिए न 'तत्' शब्द है, न 'किम्' शब्द है (अर्थात् न प्रश्न है, न उत्तर) और न ही अन्य कोई शब्द है। न माता, न पिता, न बन्धु, न पत्नी, न पुत्र, न मित्र और न ही अन्य कोई सम्बन्ध है। फिर भी साधकों को आत्मस्वरूप को जानने की आकांक्षा तथा जीवन्मुक्ति की प्राप्ति के लिए सन्त-सेवा करनी चाहिए। स्त्री, पुत्र, धन और गृह—सब कुछ उन्हें (सद्गुरु को) अर्पित कर देना चाहिए, अर्थात् इनके प्रति अपना मोह त्याग देना चाहिए। कर्मद्वैत नहीं, भावाद्वैत का आचरण करना चाहिए। सर्वात्मभाव को दृढ़ करना चाहिए। किन्तु गुरु के प्रति द्वैतभाव अवश्य रखना चाहिए, क्योंकि उनसे बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं है। उन्हीं के द्वारा सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है, अर्थात् गुरु की कृपा से ही सब कुछ जाना जाता है। उनसे बढ़कर और कौन है? (अर्थात् कोई नहीं।) जो इस तत्त्व को सम्यक् रूप से जान लेता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है।
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