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अध्याय 2 — द्वितीयः खण्डः
सुबाल
4 श्लोक • केवल अनुवाद
(उस पूर्व वर्णित विराट् के)
अपान वायु से निषाद, यक्ष, राक्षस और गन्धर्व, अस्थियों से पर्वत, रोमों से ओषधि-वनस्पतियाँ और क्रोध
(युक्त)
ललाट से रुद्र उत्पन्न हुए।
वह विराट् पुरुष महान् भूतरूप है, उसके निः श्वास ही ऋण, यजु, साम, अधर्व, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष शास्त्र, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, व्याख्यान, उपव्याख्यान और सभी प्राणी हैं।
वह
(विराट्)
हिरण्य
(स्वर्ण)
के समान ज्योतिर्मय है, जिसमें यह आत्मा
(प्रत्यगात्मा)
और समस्त लोक अवस्थित हैं। उसने अपने दो भाग किये, जिनमें आधे से स्त्री और आधे से पुरुष प्रकट हुआ। उसने देव होकर देवों का सृजन किया, ऋषि होकर ऋषियों का सृजन किया। इसी प्रकार यक्ष, राक्षस और गन्धवों को बनाया। तत्पश्चात् ग्रामों तथा अरण्यों में रहने वाले पशुओं का सृजन किया। इनमें कोई गाय, कोई बैल, कोई घोड़ी, कोई घोड़ा, कोई गधा, कोई गधी, कोई सबका पालन करने वाली और कोई सबका पालक हुआ।
अन्त में वह
(विराट् पुरुष)
वैश्वानराग्नि होकर समस्त प्राणियों को जला देता है।
यह पृथिवी जल में लय हो जाती है, जल तेज में, तेज वायु में, वायु आकाश में, आकाश इन्द्रियों में, इन्द्रियाँ तन्मात्राओं में, तन्मात्राएँ भूतादि
(अहंकार)
में, अहंकार-भहत् तत्त्व में, महत् तत्त्व अव्यक्त में, अव्यक्त अक्षर में, अक्षर तमस्
(अज्ञान)
में लय हो जाता है और तमस् परम देव
(परमेश्वर)
में एकाकार हो जाता है।
इसके पश्चात् न संत् रहता है, न असत् रहता है और न सत्-असत् का सम्मिलित रूप रहता है।
यही निर्वाण का अनुशासन है और यही वेद का अनुशासन एवं शिक्षा है।
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