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सुबाल • अध्याय 2 • श्लोक 4
सोऽन्ते वैश्वानरो भूत्वा संदग्ध्वा सर्वाणि भूतानि पृथिव्यप्सु प्रलीयत आपस्तेजसि प्रलीयन्ते तेजो वायौ विलीयते वायुराकाशे विलीयत आकाशमिन्द्रियेष्विन्द्रियाणि तन्मात्रेषु तन्त्राणि भूतादौ विलीयन्ते भूतादिर्महति विलीयते महान व्यक्ते विलीयतेऽव्यक्तमक्षरे बिलीयते अक्षरं तमसि विलीयते तमः परे देव एकीभवति परस्तान्न सन्त्रासन्न सदसदित्येतन्निर्वाणा-नुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥
अन्त में वह (विराट् पुरुष) वैश्वानराग्रि होकर समस्त प्राणियों को जला देता है। यह पृथिवी जल में लय हो जाती है, जल तेज में, तेज वायु में, वायु आकाश में, आकाश इन्द्रियों में, इन्द्रियाँ तन्मात्राओं में, तन्मात्राएँ भूतादि (अहंकार) में, अहंकार-भहत् तत्त्व में, महत् तत्त्व अव्यक्त में, अव्यक्त अक्षर में, अक्षर तमस् (अज्ञान) में लय हो जाता है और तमस् परम देव (परमेश्वर) में एकाकार हो जाता है। इसके पश्चात् न संत् रहता है, न असत् रहता है और न सत्-असत् का सम्मिलित रूप रहता है। यही निर्वाण का अनुशासन है और यही वेद का अनुशासन एवं शिक्षा है।
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