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अध्याय 3 — मनोनिन्दा

प्रबोधसुधाकर
4 श्लोक • केवल अनुवाद
इस तृष्णा-राक्षसी के अधीन होकर यह चित्त पिशाचरूप हो गया है। कभी हँसता है, कभी रोता है और कभी भ्रान्त-सा होकर दशो दिशाओं में घूमने छगता है। (इसी प्रकार) कभी हर्षित होता है और कभी रुष्ट हो जाता है।
(विवेकहीन हो जाने के कारण) यह भद्र पुरुषों की निन्दा करता है और दुष्ट की स्तुति तथा कभी तो किसी से रोषपूर्वक द्वेष करने लगता हैं और कभी अपनी प्रशंसा करने लगता है।
मार्ग में पड़ी हुई हड्डी को जिस प्रकार कुत्ते अपनी-अपनी ओर खींचते हैं उसी प्रकार यह चित्त दम्भ, अभिमान, लोभ, काम, क्रोध और मत्सरादि से चारों ओर से खीचा जा रहा है।
अतः शुद्ध वैराग्य का आश्रय लेकर जो पदार्थ मन को रुचिकर हों उन्हें त्याग दे और जो बात उसे रुचिकर न हो वही करे, इससे चित्त निष्क्रिय हो जाता है।
Krishjan
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