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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 3 • श्लोक 2
किमपि द्वेष्टि सरोषं ह्यात्मानं श्लाघते कदाचिदपि । चित्तं पिशाचमभवद्राक्षस्या तृष्णया व्याप्तम् ॥
(विवेकहीन हो जाने के कारण) यह भद्र पुरुषों की निन्दा करता है और दुष्ट की स्तुति तथा कभी तो किसी से रोषपूर्वक द्वेष करने लगता हैं और कभी अपनी प्रशंसा करने लगता है।
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