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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 3 • श्लोक 1
हसति कदाचिद्रौति भ्रान्तं सद्दश दिशो भ्रमति । हृष्टं कदापि रुष्टं शिष्टं दुष्टं च निन्दति स्तौति ॥
इस तृष्णा-राक्षसी के अधीन होकर यह चित्त पिशाचरूप हो गया है। कभी हँसता है, कभी रोता है और कभी भ्रान्त-सा होकर दशो दिशाओं में घूमने छगता है। (इसी प्रकार) कभी हर्षित होता है और कभी रुष्ट हो जाता है।
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