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अध्याय 1 — जाबाल्युपनिषद्

जबालि
23 श्लोक • केवल अनुवाद
ऋषि पैप्पलादि (पिप्पलाद के पुत्र) ने भगवान् जाबालि से प्रश्न किया हे भगवन्! मेरे प्रति परम तत्त्व के रहस्य का वर्णन कीजिए।
तत्त्व क्या है? जीव कौन है? पशु कौन है? ईश कौन है? मोक्ष प्राप्ति का उपाय क्या है?
महर्षि जाबालि ने कहा - आपने बहुत श्रेष्ठ प्रश्न किया। जो मुझे ज्ञात है, वह सब मैं आपसे निवेदन करता हूँ।
पैप्पलादि ने पूछा - यह सब आपको कहाँ से ज्ञात हुआ?
जाबालि ने कहा - षडानन से ज्ञात हुआ।
पैप्पलादि ने पुनः पूछा - उन (षडानन) को कहाँ से यह ज्ञान प्राप्त हुआ?
जाबालि ने कहा - उन्हें यह ज्ञान ईशान से प्राप्त हुआ।
पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया कि उन्होंने यह कैसे प्राप्त किया?
जाबालि ने उत्तर दिया कि उन्होंने (ईशान ने) उपासना के द्वारा यह ज्ञान प्राप्त किया।
(यह सुनकर) पैप्पलादि ने कहा - हे भगवन्! मुझे यह सब कुछ रहस्य सहित बताइये।
पैप्पलादि द्वारा पूछे जाने पर जाबालि ने कहा - मैं सम्पूर्ण तत्त्व कहता हूँ। स्वयं पशुपति ही अहंकार युक्त होकर संसारी जीव हो जाता है। वहीं पशु है। सर्वज्ञ और पञ्च कृत्यों से सम्पन्न, सर्वेश्वर ईश ही पशुपति है।
पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया पशु कौन है?
जाबालि ने कहा - जीव को ही पशु कहा गया है। जीवों के पति होने के कारण उन्हें पशुपति कहते हैं।
उन्होंने फिर पूछा - जीव पशु किस तरह है? और (पशुपति) उनके पति कैसे हैं?
महर्षि जाबालि ने उत्तर दिया जिस प्रकार घास का सेवन करने वाले, विवेक हीन, किसी अन्य के दास, कृषि आदि कार्यों में नियोजित अनेक प्रकार के दुःखों को सहन करने वाले, अपने स्वामी के बन्धन में बँधे हुए गौ आदि पशु होते हैं (उसी प्रकार ये जीव भी ईश्वर के बन्धन में बंधे रहते हैं)। जैसे उन पशुओं के स्वामी (कोई मनुष्य) होते हैं उसी प्रकार समस्त जीवों के स्वामी (पति) सर्वज्ञ, ईश्वर-पशुपति होते हैं।
पैप्पलादि ने पुनः पूछा - वह ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है?
पैप्पलादि ने पूछा - उसे धारण करने की विधि क्या है?
उसे कहाँ-कहाँ धारण करना चाहिए?
ऋषि जाबालि ने कहा - 'सद्योजात' आदि पाँच ब्रह्म मन्त्रों से भस्म का संग्रह करे, फिर 'अग्निरिति' इस मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करे, 'मानस्तोक' (यजु० १६.१६) इस मंत्र से उसे उठावे, तत्पश्चात् उसे जल से गीला करके 'त्र्यायुषम्' (यजु० ३.६२) इस मंत्र से सिर, ललाट, वक्षस्थल, कन्धों पर धारण करे। इसके बाद तीन त्र्यायुष और तीन त्र्यम्बक (यजु० ३.६०) मन्त्रों से तीन रेखायें खींचे। वेदों में यह शाम्भव व्रत वेदवादियों के द्वारा बतलाया गया है। इसका (इस व्रत का) आचरण करने वाले मुमुक्षु का पुनर्जन्म नहीं होता। (यहाँ जिन मन्त्रों का संक्षिमांश दिया है, उनमें जो मन्त्र यजुर्वेद के हैं, उनके सन्दर्भ दे दिये गये हैं। शेष के मन्त्र इस प्रकार हैं- सद्योजातादि पाँच मन्त्र ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवेभवे नाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥ १ ॥ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः। श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः। कालाय नमः कल विकरणाय नमो बल विकरणाय नमः ॥ २॥ बलाय नमो बल प्रमथनाय नमः। सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥ ३॥ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्व शर्वेभ्यो नमस्तेऽअस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥४॥ तत्पुरुषाय वि‌द्महे महादेवाय धीमहि। तत्रो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ ५ ॥ (रुद्राष्टाध्यायी) अग्निरिति ॐ अग्निरिति भस्म। वायुरिति भस्म। जलमिति भस्म । स्थलमिति भस्म। व्योमेति भस्य। सर्व ह वा इदं धस्य। मन एतानि चक्षुषि भस्मानि इति ॥ (आह्निक सूत्रावलिः पृ. १५))
प्रमाण के विषय में पूछने पर सनत्कुमार ने बताया कि त्रिपुण्ड्र धारण करने के लिए तीन आड़ी रेखायें सम्पूर्ण ललाट के मध्य, भौंहों और नेत्रों तक खींचे।
जो इसकी प्रथम रेखा है, वह गार्हपत्य अग्नि रजोगुण 'अ' कार भूलोक, अपनी आत्मा की क्रिया-शक्ति स्वरूप, ऋग्वेद रूप और प्रातः सवन स्वरूप है, इसके देवता स्वयं प्रजापति हैं। जो इसकी द्वितीय रेखा है, वह दक्षिणाग्नि स्वरूप, सत्त्वगुण रूप, 'उ' कार रूप, अन्तरिक्ष स्वरूप, अपनी अन्तरात्मा की इच्छा-शक्ति रूप, यजुर्वेद रूप और माध्यन्दिन सवनरूप है, इसके देवता विष्णु हैं। जो इसकी तृतीय रेखा है, वह आहवनीय अग्निरूप, 'म' कार रूप, तमोगुण स्वरूप, द्युलोकरूप, परमात्मा की ज्ञान-शक्ति स्वरूप, सामवेद रूप तथा तृतीय सवन स्वरूप है, इसके देवता स्वयं महादेव (शिव) हैं।
जो विद्वान् ब्रह्मचारी, गृहस्थी, वानप्रस्थी या यति भस्म का त्रिपुण्ड्र धारण करता है, (पूर्वमंत्र में दर्शाये गये त्रिपुण्ड्र के मर्म को आत्मसात् करता है।) वह महापातकों और उपपातकों से विमुक्त हो जाता है। वह समस्त वेदों का अवगाहन करने वाला, समस्त देवताओं का ध्यान करने वाला, समस्त तीर्थों के स्नान का पुण्य प्राप्त करने वाला और सकल रुद्र मन्त्रों का जप कर्ता हो जाता है। उसका (ऐसा करने वाले का) इस जगत् में पुनरावर्तन नहीं होता, पुनरावर्तन नहीं होता।
यह सत्य है (इस प्रकार) यह उपनिषद् पूर्ण हुई।
Krishjan
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