मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
जबालि • अध्याय 1 • श्लोक 19
पुनः स तमुवाच सद्योजातादिपञ्चब्रह्ममन्त्रैर्भस्म संगृह्याग्निरिति भस्मेत्यनेनाभिमन्य मानस्तोक इति समुद्धत्य जलेन संसृज्य त्र्यायुषमिति शिरोललाटवक्षः स्कन्धेष्विति तिसृभिव्यायुषैव्यम्बकैस्तिस्त्रो रेखाः प्रकुर्वीत। व्रतमेतच्छाम्भवं सर्वेषु वेदेषु वेदवादिभिरुक्तं भवति । तत्समाचरेन्मुमुक्षुर्न पुनर्भवाय ॥
ऋषि जाबालि ने कहा - 'सद्योजात' आदि पाँच ब्रह्म मन्त्रों से भस्म का संग्रह करे, फिर 'अग्निरिति' इस मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करे, 'मानस्तोक' (यजु० १६.१६) इस मंत्र से उसे उठावे, तत्पश्चात् उसे जल से गीला करके 'त्र्यायुषम्' (यजु० ३.६२) इस मंत्र से सिर, ललाट, वक्षस्थल, कन्धों पर धारण करे। इसके बाद तीन त्र्यायुष और तीन त्र्यम्बक (यजु० ३.६०) मन्त्रों से तीन रेखायें खींचे। वेदों में यह शाम्भव व्रत वेदवादियों के द्वारा बतलाया गया है। इसका (इस व्रत का) आचरण करने वाले मुमुक्षु का पुनर्जन्म नहीं होता। (यहाँ जिन मन्त्रों का संक्षिमांश दिया है, उनमें जो मन्त्र यजुर्वेद के हैं, उनके सन्दर्भ दे दिये गये हैं। शेष के मन्त्र इस प्रकार हैं- सद्योजातादि पाँच मन्त्र ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवेभवे नाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥ १ ॥ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः। श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः। कालाय नमः कल विकरणाय नमो बल विकरणाय नमः ॥ २॥ बलाय नमो बल प्रमथनाय नमः। सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥ ३॥ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्व शर्वेभ्यो नमस्तेऽअस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥४॥ तत्पुरुषाय वि‌द्महे महादेवाय धीमहि। तत्रो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ ५ ॥ (रुद्राष्टाध्यायी) अग्निरिति ॐ अग्निरिति भस्म। वायुरिति भस्म। जलमिति भस्म । स्थलमिति भस्म। व्योमेति भस्य। सर्व ह वा इदं धस्य। मन एतानि चक्षुषि भस्मानि इति ॥ (आह्निक सूत्रावलिः पृ. १५))
पूरा ग्रंथ पढ़ें
जबालि के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

जबालि के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें