स तेन पृष्टः सर्वं निवेदयामास तत्त्वम् ।
पशुपतिरहंकाराविष्टः संसारी जीवः स एव पशुः ।
सर्वज्ञः पञ्चकृत्यसंपन्नः सर्वेश्वर ईशः पशुपतिः ॥
पैप्पलादि द्वारा पूछे जाने पर जाबालि ने कहा - मैं सम्पूर्ण तत्त्व कहता हूँ। स्वयं पशुपति ही अहंकार युक्त होकर संसारी जीव हो जाता है। वहीं पशु है। सर्वज्ञ और पञ्च कृत्यों से सम्पन्न, सर्वेश्वर ईश ही पशुपति है।
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