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अध्याय 8 — विश्वरूपदर्शन
गणेशगीता
26 श्लोक • केवल अनुवाद
वरेण्य बोले - हे भगवन्! नारदजी के मुख से मैंने आपकी अनेक विभूतियोंका श्रवण किया है, उन्हें मैं जानता हूँ, सब नहीं जानते; क्योंकि सम्पूर्ण विभूति तो नारदजी भी नहीं जानते।
हे गजानन! आप ही उन सबको तत्त्व से जानते हैं, इस समय आप अपना मनोहर और व्यापक रूप मुझे दिखाइये।
श्रीगणेशजी बोले - अकेले मुझ में ही तुम यह चराचर संसार देखो और अनेक प्रकार के दिव्य आश्चर्य देखो, जो पूर्वकाल में किसी ने नहीं देखे हैं।
मैं अपने प्रभाव से तुमको ज्ञाननेत्र देता हूँ, क्योंकि मुझ सर्वव्यापक, अजन्मा और अव्यय को चर्मचक्षु नहीं देख सकते।
ब्रह्माजी बोले - तब वे राजा वरेण्य दिव्य दृष्टि को प्राप्त होकर भगवान् गणेशजी के महान् अद्भुत परमरूप को देखने में समर्थ हुए।
असंख्य शोभायमान मुख, असंख्य सूँड एवं हाथ और सुगन्धि से लिप्त, दिव्य भूषण, वसन और माला से शोभित,
असंख्य नेत्र, करोड़ों सूर्य की किरणों के समान प्रकाशित आयुध धारण किये उनके शरीर में राजा ने अलग-अलग तीनों लोक देखे।
यह ईश्वर का परम रूप देख प्रणाम करके राजा (वरेण्य) बोले - हे भगवन्! मैं आपकी इस देह में देवता-ऋषिगण और पितरों को देख रहा हूँ।
मैं सात पाताल, सात समुद्र, सात द्वीप, सात पर्वत, सात महर्षि और अनेक पदार्थों के समूह देख रहा हूँ।
मैं पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, मनुष्य, सर्प, राक्षस, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, देवता और अनेक प्रकार के जन्तुओं को देख रहा हूँ।
मैं अनादि, अनन्त, लोकादि, अनन्त भुजा और सिरों से युक्त तथा जलती हुई अग्नि के समान प्रकाशमान अप्रमेय पुरातन आपको देख रहा हूँ।
मैं किरीट-कुण्डल धारण किये, कठिनाई से देखने योग्य, आनन्ददायक तथा विशाल वक्षःस्थल युक्त आप प्रभु का दर्शन कर रहा हूँ।
देवता, विद्याधर, यक्ष, किन्नर, मुनि, मनुष्य, नृत्य करती हुई अप्सराओं और गान करते हुए गन्धर्वां से आपका स्वरूप सेवित है।
आठ वसु, बारह आदित्यों के गण, सिद्ध, साध्य - ये सब प्रसन्नतापूर्वक आपकी सेवा करते और महाभक्ति से विस्मय को प्राप्त होकर आपको देखते हैं।
ये आपको ज्ञाता, अक्षर, वेद्य, धर्म के रक्षक, पाताल, दिशा, स्वर्ग और पृथ्वी में व्यापक और ईश्वर जानते हैं।
आपके रूप को देखकर सम्पूर्ण लोक तथा मैं भी डर गया हूँ, यह आपका मुख अनेक तीक्ष्ण दाढ़ों से भयंकर है तथा आप अनेक विद्याओं के पारगामी हैं।
प्रलय की अग्नि के समान दीप्तिमान् आपका मुख है, जिसकी जटाएँ आकाश को छूती हैं, हे गणेशजी! आपका यह रूप देखकर मैं भ्रान्त हो गया हूँ।
देवता, मनुष्य, नागादि और खग तुम्हारे उदर में शयन करते हैं, वे अनेक योनियों को भोगकर अन्त में आप में ही उसी प्रकार प्रवेश करते हैं,
जैसे सागर से उत्पन्न हुए मेघ के जलविन्दु फिर उसी में लीन होते हैं। इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण,
वायु, कुबेर, ईशान, सोम, सूर्य और सम्पूर्ण जगत् - यह सब आप ही हैं, हे स्वामिन्! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरे ऊपर अब कृपा करें।
आप मेरे द्वारा पूर्व में देखा हुआ अपना सौम्य रूप मुझे दिखाइयें, हे भूमन्! अपनी इच्छा से क्रीडा करने वाले आपकी लीला को कौन जान सकता है?
आपकी कृपा से मैंने इस प्रकार का ऐश्वर्यशाली रूप देखा; क्योंकि आपने प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानचक्षु दिये थे।
श्रीगणेशजी बोले - हे महाबाहु! योग न करने वाले इस मेरे रूप का कभी भी दर्शन नहीं पाते, सनकादि तथा नारदादि मेरे अनुग्रह से इस रूप का दर्शन करते हैं।
चारों वेदों के अर्थ के तत्त्व को जानने वाले, सम्पूर्ण शास्त्रों में कुशल, यज्ञ, दान और तप करने वाले भी मेरे रूप को (यथार्थतः) नहीं जानते।
मैं भक्तिभाव से जानने, दीखने, प्राप्त होने के योग्य हूँ, अब तुम भय और मोह को त्याग कर मेरे सौम्य रूप को देखो।
हे राजन्! जो भक्त मेरे परायण एवं सर्व संगत्यागी होकर सब कर्म मुझमें ही समर्पित करते हैं और क्रोध त्यागकर सर्व प्राणियों में समान दृष्टि रखते हैं, वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।
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