वरेण्य उवाच-
भगवन्नारदो मह्यं तव नाना विभूतयः ।
उक्तवांस्ता अहं वेद न सर्वाः सोऽपि वेत्ति ताः ॥
वरेण्य बोले - हे भगवन्! नारदजी के मुख से मैंने आपकी अनेक विभूतियोंका श्रवण किया है, उन्हें मैं जानता हूँ, सब नहीं जानते; क्योंकि सम्पूर्ण विभूति तो नारदजी भी नहीं जानते।
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