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गणेशगीता • अध्याय 8 • श्लोक 4
ज्ञानचक्षुरहं तेऽद्य सृजामि स्वप्रभावतः । चर्मचक्षुः कथं पश्येन्मां विभुं ह्यजमव्ययम् ॥
मैं अपने प्रभाव से तुमको ज्ञाननेत्र देता हूँ, क्योंकि मुझ सर्वव्यापक, अजन्मा और अव्यय को चर्मचक्षु नहीं देख सकते।
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