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अध्याय 1 — द्वय उपनिषद्

द्वय
7 श्लोक • केवल अनुवाद
अब श्रीमद्वय की उत्पत्ति विवेचित की जाती है (इसकी महत्ता वर्णित की जाती है)। द्वितीय वाक्य है। षट्‌पद अष्टादश संख्या वाले हैं। इसमें पच्चीस अक्षर हैं। पन्द्रह अक्षर पहले और दस अक्षर बाद में हैं। पूर्व में नारायण को अनादि सिद्ध कहा गया है, जो सदाचार के मूल और मंत्रों में रत्न स्वरूप हैं। (यह उपनिषद् श्रीमद् (श्रीसम्पन्न) द्वय (दो) की उत्पत्ति के संकल्प के साथ प्रारम्भ होता है।' वाक्य' को द्वितीय कहने से स्पष्ट होता है कि प्रथम' अक्षर' को माना गया है। अक्षर अविनाशी अव्यक्त भी है, जो सदैव से है, अतः प्रथम है; वाक्य उसकी अभिव्यक्ति होने से द्वितीय है। ऋषि ने उस प्रथम या पूर्व को अनादिसिद्ध-मन्त्ररत्र नारायण कहा है, इस आधार पर वह प्रथम अक्षर 'ॐ' कहा जा सकता है। ब्रह्य की प्रथम अभिव्यक्ति अक्षर या नारायण है, वह द्वितीय वाक्य या आचार्य रूप गुरु का मूल है। इस द्वितीय आचार्यरूप गुरु का विवेचन आगे के मन्त्रों में किया गया है।)
जो आचार्य वेद सम्पन्न, मंत्रों का ज्ञाता, मंत्रों का भक्त, मंत्रों का आश्रय लेने वाला, पुराणज्ञ, विशेषज्ञ, पवित्र, ईर्ष्यारहित, विष्णु भक्त और गुरु भक्त है, ऐसे लक्षणों से सम्पन व्यक्ति को 'गुरु' कहते हैं।
जो शास्त्रों के अर्थ को सम्यक् प्रकार से चुनता है (समझता है) और सदाचार की न केवल स्थापना करता है, वरन् स्वयं भी वैसा ही आचरण (सदाचरण) करता है, उसे आचार्य कहते हैं।
गुरु शब्द में 'गु' का अर्थ अन्धकार और 'रु' शब्द का अर्थ उसका (अन्धकार का) निरोधक है। (अज्ञान के) अन्धकार को रोकने के कारण ही (अन्धकार रोकने वाले व्यक्ति को) गुरु कहते हैं।
गुरु ही परम ब्रह्म है, गुरु ही परागति है, गुरु ही परम विद्या है और गुरु को ही परम धन कहा गया है।
गुरु ही सर्वोत्तम अभिलषित वस्तु है, गुरु ही परम आश्रय स्थल है तथा परम ज्ञान का उपदेष्टा होने के कारण ही गुरु महान् (गुरुतर) होता है।
'गुरु' शब्द का उच्चारण एक बार भी कर लेने से संसार से मुक्ति प्राप्त हो जाती है। उसके (गुरु उच्चारण से) सभी पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। फिर वह कदापि इस संसार में पुनरागमन नहीं करता, कभी पुनरावर्तन नहीं करता, यह सत्य है। जो इसे ठीक प्रकार समझता है (उसे सभी फल प्राप्त होते हैं)।
Krishjan
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