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द्वय • अध्याय 1 • श्लोक 2
आचार्यों वेदसंपन्नो विष्णुभक्तो विमत्सरः । मन्त्रज्ञो मन्त्रभक्तश्च सदामन्त्राश्रयः शुचिः ॥ गुरुभक्तिसमायुक्तः पुराणज्ञो विशेषवित्। एवं लक्षणसंपन्नो गुरुरित्यभिधीयते ॥
जो आचार्य वेद सम्पन्न, मंत्रों का ज्ञाता, मंत्रों का भक्त, मंत्रों का आश्रय लेने वाला, पुराणज्ञ, विशेषज्ञ, पवित्र, ईर्ष्यारहित, विष्णु भक्त और गुरु भक्त है, ऐसे लक्षणों से सम्पन व्यक्ति को 'गुरु' कहते हैं।
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