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द्वय • अध्याय 1 • श्लोक 6
गुरुरेव परः कामः गुरुरेव परायणः । यस्मात्तदुपदेष्टासौ तस्माद्‌गुरुतरो गुरुः ॥
गुरु ही सर्वोत्तम अभिलषित वस्तु है, गुरु ही परम आश्रय स्थल है तथा परम ज्ञान का उपदेष्टा होने के कारण ही गुरु महान् (गुरुतर) होता है।
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