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अध्याय 99 — अथ तिथिकर्मगुणाध्यायः

बृहत्संहिता
3 श्लोक • केवल अनुवाद
ब्रह्मा, विधाता, विष्णु, यम, चन्द्र, कार्तिकेय, इन्द्र, वसु, सर्प, धर्म, शिव, सूर्य, कामदेव, कलि-ये क्रम से प्रतिपदा आदि तिथियों के स्वामी कहे गये हैं। जैसे- प्रतिपदा के ब्रह्मा, द्वितीया के विधाता, तृतीया के विष्णु इत्यादि स्वामी हैं तथा अमावस्या के स्वामी पितर हैं।
इन तिथियों में संज्ञातुल्य कार्य करना चाहिये। जैसे- प्रतिपदा में ब्रह्मकर्म (विवाह आदि); द्वितीया में भवननिर्माण आदि: तृतीया में चौलकरण, दमन आदि; चतुर्थी में शत्रु का मारण आदि; पञ्चमी में वमन, औषधिसेवन, पौष्टिक कर्म आदि; षष्ठी में मित्रसंग्रह, अभिषेक आदि; सप्तमी में गाड़ी, सवारी, क्रिया, गमन आदि; अष्टमी में शखग्रहण
दुर्ग, उपकरण आदि: नवमी में परविघात, मारण आदि; दशसी में धर्म, ब्राह्मण, तर्पण आदि; एकादशी में स्थिर, चर, मृदु, सौम्य कर्म आदि; द्वादशी में अग्न्याधान आदि; त्रयोदशी में मैत्री, कामसेवन आदि; चतुर्दशी में विष, रस के प्रयोग आदि और पञ्चदशी में पितृतर्पण आदि कार्य करना चाहिये। नन्दा, भद्रा, विजया, रिक्ता, पूर्णा- ये तिथियाँ तीन प्रकार की होती हैं,
Krishjan
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