दुर्ग, उपकरण आदि: नवमी में परविघात, मारण आदि; दशसी में धर्म, ब्राह्मण, तर्पण आदि; एकादशी में स्थिर, चर, मृदु, सौम्य कर्म आदि; द्वादशी में अग्न्याधान आदि; त्रयोदशी में मैत्री, कामसेवन आदि; चतुर्दशी में विष, रस के प्रयोग आदि और पञ्चदशी में पितृतर्पण आदि कार्य करना चाहिये। नन्दा, भद्रा, विजया, रिक्ता, पूर्णा- ये तिथियाँ तीन प्रकार की होती हैं,
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