इन तिथियों में संज्ञातुल्य कार्य करना चाहिये। जैसे- प्रतिपदा में ब्रह्मकर्म (विवाह आदि); द्वितीया में भवननिर्माण आदि: तृतीया में चौलकरण, दमन आदि; चतुर्थी में शत्रु का मारण आदि; पञ्चमी में वमन, औषधिसेवन, पौष्टिक कर्म आदि; षष्ठी में मित्रसंग्रह, अभिषेक आदि; सप्तमी में गाड़ी, सवारी, क्रिया, गमन आदि; अष्टमी में शखग्रहण
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