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बृहत्संहिता • अध्याय 99 • श्लोक 2
पितरोऽमावस्यायां संज्ञासदृशाश्च तैः क्रियाः कार्याः । नन्दा भद्रा विजया रिक्ता पूर्णा च तात्रिविधाः ॥
इन तिथियों में संज्ञातुल्य कार्य करना चाहिये। जैसे- प्रतिपदा में ब्रह्मकर्म (विवाह आदि); द्वितीया में भवननिर्माण आदि: तृतीया में चौलकरण, दमन आदि; चतुर्थी में शत्रु का मारण आदि; पञ्चमी में वमन, औषधिसेवन, पौष्टिक कर्म आदि; षष्ठी में मित्रसंग्रह, अभिषेक आदि; सप्तमी में गाड़ी, सवारी, क्रिया, गमन आदि; अष्टमी में शखग्रहण
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