Krishjan
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अध्याय 72 — अथ चामरलक्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
6 श्लोक • केवल अनुवाद
देवताओं ने बाल के लिये हिमालय की कन्दराओं में चमरी की उत्पत्ति की है। उनकी पूँछ के बाल पीले, काले और सफेद होते हैं।
स्निग्ध, कोमल, अधिक निर्मल, परस्पर विना मिले, छोटी, मध्य की हड्डी वाले, सफेद-ये सब बालों के गुणों की सम्पत्तियाँ हैं अर्थात् ऐसे बाल शुभ होते हैं तथा टूटे, फटे, छोटे और उखड़े बाल शुभ नहीं होते हैं।
अन्य चामरस्याभ्ध्यर्धहस्तयितः सार्धहस्तमितो दण्डः कार्यः। हस्तोऽचवा हस्तप्रमाणः।
यहि छत्र, अंकुश, वेत्र, धनुष, वितान, भाला ध्वज और चामर के दण्ड के वर्ग ब्राह्मण आदि वणों के लिये क्रम से पीत, पीत-लोहित, शहद के समान और काला होना चाहिये। इस तरह यह पाहि आदि हित के लिये होते हैं।
पूर्वोक्त दण्डों के दो पर्व लेकर दो-दो की वृद्धि करके बारह पर्व तक का क्रम से मातृक्षय आदि फल जानना चाहिये। जैसे दो पर्व का दण्ड मातृक्षय, चार पर्व का भूमिक्षय, छः पर्व का धनक्षय, आत पर्व का कुलक्षय, दश पर्व का रोग और बारह पर्व का दण्ड मृत्यु करता है।
दण्डों में तीन पर्व हों तो दण्ड के स्वामियों को यात्रा में विजय, पाँच पर्व हो तो शत्रुओं का नारा, स्वत पर्व हों तो बहुत लाभ, नौ पर्व हों तो भूमिलाभ, ग्यारह पर्व हो तो पशुओं को वृद्धि और तेरह पर्व हों तो दण्ड के स्वामियों को अभीष्ट वस्तु का लाभ
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