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अध्याय 37 — अथ प्रतिसूर्यलक्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
3 श्लोक • केवल अनुवाद
सूर्य के ऋतु वर्ष (तीसरे अध्याय के तेईसवें पद्य में उक्त) के सदृश वर्ण का प्रतिसूर्य होता है। यदि यह निर्मल, वैदूर्यमणि की तरह स्वच्छ और खेत हो तो क्षेम और सुभिक्ष करता है।
पीत वर्ष का प्रतिसूर्य व्याधि करता है। अशोक पुष्य के समान लोहित वर्ष का प्रतिसूर्य शखकोप के लिये होता है। यदि प्रतिसूर्य की माला दिखाई दे तो चोर का भय तथा उपद्रव और राजा का नाश करता है।
यदि सूर्यमण्डल को उत्तर दिशा में प्रतिसूर्य दिखाई पड़े तो वृष्टि होती है, दक्षिण ४५३ दिशा में प्रतिसूर्य दिखाई दे तो वायु करता है। दोनों तरफ दिखाई दे तो राजा का और नीचे की तरफ दिखाई पड़े तो लोगों का नाश करता है।
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