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अध्याय 102 — अथ राशिविभागाध्यायः

बृहत्संहिता
7 श्लोक • केवल अनुवाद
अश्विनी का चार पाद, भरणी का चार पाद और कृत्तिका का आद्य पाद मेष राशि का तथा कृत्तिका का शेष तीन पाद, रोहिणी का चार पाद और मृगशिरा का प्रथम से पाद वृष राशि होता है ।
मृगशिरा का शेष दो पाद, आर्दा का चार पाद और पुनर्वसु का प्रथम तीन पाद मिथुन राशि का तथा पुनर्वसु का शेष एक पाद, पुष्य का चार पाद और अश्लेषा का चार पाद कर्कट राशि का होता है।
मघा का चार पाद, पूर्वफाल्गुनी का चार पाद और उत्तरफाल्गुनी का प्रथम एक पाद सिंह राशि का तथा उत्तरफाल्गुनी का शेष तीन पाद, हस्त का चार पाद और चित्रा का आद्य दो पाद कन्या राशि का होता है।
चित्रा का शेष दो पाद, स्वाति का चार पाद और विशाखा का आद्य तीन पाद तुला राशि का तथा विशाखा का शेष एक पाद, अनुराधा का चार पाद और ज्येष्ठा का चार पाद वृश्चिक राशि का होता है।
मूल का चार पाद, पूर्वाषाढ़ा का चार पाद और उत्तराषाढ़ा का प्रथम एक पाद धनु राशि का तथा उत्तराषाढ़ा का शेष तीन पाद, अवण का चार प्राद और धनिष्ठा का प्रथम दो पाद मकर राशि का होता है।
धनिष्ठा का शेष दो पाद, शतभिषा का चार पाद और पूर्वाभाद्रपदा का प्रथम तीन पाद कुम्भ राशि का तथा पूर्वाभाद्रपदा का शेष एक पाद, उत्तरभाद्रपदा का चार पाद और रेवती का चार पाद मीन राशि का हुजा है।
अश्विनी, मया और मूल नक्षत्र के आदि से क्रमशः मेष, सिंह और धनु राति प्रारम्भ होती है तथा विषम नक्षत्र (कृत्तिका, मृगशिर, पुनर्वसु और आश्लेषा) से एक-एक पाद वृद्धि करके समाप्त होती है।
Krishjan
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