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बृहत्संहिता • अध्याय 102 • श्लोक 7
अश्विनीपित्र्यमूलाद्या मेषसिंहहयादयः । विषमर्सान्निवर्तन्ते पादवृद्धया यथोत्तरम् ॥
अश्विनी, मया और मूल नक्षत्र के आदि से क्रमशः मेष, सिंह और धनु राति प्रारम्भ होती है तथा विषम नक्षत्र (कृत्तिका, मृगशिर, पुनर्वसु और आश्लेषा) से एक-एक पाद वृद्धि करके समाप्त होती है।
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