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अध्याय 3 — तृतीय खण्ड
मुद्गल
3 श्लोक • केवल अनुवाद
एक ही परम देव
अनेक रूपों में समस्त जगत् में स्थित है। वह स्वयं
अजन्मा
(जन्मरहित)
होते हुए भी, अपनी शक्ति से
अनेक प्रकार से प्रकट होता हुआ
प्रतीत होता है।
अध्वर्यु
(यजुर्वेदीय यज्ञ करने वाले ऋत्विज्)
इस परम तत्त्व की
अग्नि
के रूप में उपासना करते हैं।
यजुर्वेदी
इसे
"यजुः"
कहते हैं, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् को परस्पर जोड़कर धारण करता है।
सामवेदी
इसे
"साम"
कहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण जगत् इसी में प्रतिष्ठित है।
सर्प
इसे
"विष"
कहते हैं, और
सर्पविद्या के ज्ञाता
इसे
"सर्प"
कहते हैं।
देवता
इसे
"ऊर्ज्"
(शक्ति अथवा पोषण)
कहते हैं, और
मनुष्य
इसे
"रयि"
(धन अथवा संपत्ति)
कहते हैं।
असुर
इसे
"माया"
कहते हैं, और
पितृगण
इसे
"स्वधा"
कहते हैं।
देवजनविद्या के ज्ञाता
इसे
"देवजन"
कहते हैं।
गन्धर्व
इसे
"रूप"
कहते हैं, और
अप्सराएँ
इसे
"गन्धर्व"
कहती हैं।
जिस प्रकार कोई उस
परम तत्त्व
की उपासना करता है, वह उसी प्रकार का फल प्राप्त करता है और उसी के अनुरूप बन जाता है। इसलिए
ब्राह्मण
(ब्रह्मतत्त्व के ज्ञाता अथवा साधक)
को यह भावना करनी चाहिए कि—
"यह पुरुषरूप परमब्रह्म ही मैं हूँ।"
इस प्रकार भावनापूर्वक उपासना करने वाला साधक
उसी स्वरूप को प्राप्त हो जाता है
।
जो इस प्रकार जानता है, वह वास्तव में तत्त्वज्ञान को प्राप्त होता है।
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