अध्वर्यु(यजुर्वेदीय यज्ञ करने वाले ऋत्विज्) इस परम तत्त्व की अग्नि के रूप में उपासना करते हैं।
यजुर्वेदी इसे "यजुः" कहते हैं, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् को परस्पर जोड़कर धारण करता है।
सामवेदी इसे "साम" कहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण जगत् इसी में प्रतिष्ठित है।
सर्प इसे "विष" कहते हैं, और सर्पविद्या के ज्ञाता इसे "सर्प" कहते हैं।
देवता इसे "ऊर्ज्"(शक्ति अथवा पोषण) कहते हैं, और मनुष्य इसे "रयि"(धन अथवा संपत्ति) कहते हैं।
असुर इसे "माया" कहते हैं, और पितृगण इसे "स्वधा" कहते हैं।
देवजनविद्या के ज्ञाता इसे "देवजन" कहते हैं।
गन्धर्व इसे "रूप" कहते हैं, और अप्सराएँ इसे "गन्धर्व" कहती हैं।
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