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अध्याय 4 — चतुर्थोपदेश

घेरण्ड संहिता
5 श्लोक • केवल अनुवाद
इसके बाद मैं उत्तम प्रत्याहार विषय को कहता हूँ। जिसके विशिष्ट ज्ञान से कामादि शत्रुओं का नाश होता है।
जहाँ-जहाँ मन जाता है, मन (वहाँ-वहाँ उतना ही) चञ्चल और अस्थिर होता है। अत: मन की चंचलता को (इस प्रत्याहार से) रोककर अपने वश में लाना चाहिये।
पुरस्कार हो, तिरस्कार हो, कान के लिये अच्छा हो या बुरा हो, उस सबसे मन को रोककर अपने वश में ही लाना चाहिये।
सुगंध हो या दुर्गन्ध हो, सूँगने में जो भी आये, मन उसमें चला जाता है, अत: मन को उससे लौटाये और अपने वश में लाना चाहिये।
मीठा, खट्टा, तीखा आदि रसों में मन जब जाता है तो उससे मन को लौटाये और अपने वश में लाये।
Krishjan
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