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घेरण्ड संहिता • अध्याय 4 • श्लोक 2
यतो यतो मनश्चरति मनश्ञ्जलमस्थिरम्‌ । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌ ॥
जहाँ-जहाँ मन जाता है, मन (वहाँ-वहाँ उतना ही) चञ्चल और अस्थिर होता है। अत: मन की चंचलता को (इस प्रत्याहार से) रोककर अपने वश में लाना चाहिये।
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