धूमध्यात्तु मूर्धान्तमाकाशस्थानमुच्यते।
व्योम वृत्तं च धूघ्रं च हकाराक्षरभासुरम् ॥
भृकुटी के मध्य भाग से लेकर मूर्धा के अन्त तक का आकाश तत्त्व का क्षेत्र कहा गया है। यह व्योमवृत्त के आकार वाला, धूम्र वर्ण से युक्त तथा 'ह' कार (अक्षर) से प्रकाशित है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
योगतत्त्व के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
योगतत्त्व के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।