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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 96
धारयेत्पश्च्च घटिका वायुवद्व्योमगो भवेत्। मरणं न तु वायोश्च भयं भवति योगिनः ॥
इस तरह पाँच घटी अर्थात् दो घंटे तक उन विश्वतोमुख भगवान् का ध्यान करने से योगी वायु के सदृश आकाश में गमन करने वाला हो जाता है। उस महान् योगी को वायु से किसी भी तरह का भय नहीं व्याप्त होता तथा वह वायु से मृत्यु को भी नहीं प्राप्त होता।
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