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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 95
मारुतं मरुतां स्थाने यकाराक्षरभासुरम् । धारयेत्तत्र सर्वज्ञमीश्वरं विश्वतोमुखम् ॥
महत् स्थान पर यकार होता है। यहाँ' य' अक्षर के सहित विश्वतोमुख सर्वज्ञ ईश्वर का सतत चिन्तन करना चाहिए।
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