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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 93
धारयेत्पञ्च घटिका वह्निनासौ न दाह्यते। न दह्यते शरीरं च प्रविष्टस्याग्निमण्डले ॥
पाँच घटी (२ घंटे) तक इस तरह से चिन्तन करने से वह (योगी) अग्नि से नहीं जलाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रखर जलती हुई अग्नि में भी संयोगवश प्रविष्ट कराया जाए, तो भी वह नहीं जलता।
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