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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 91
वह्निस्विकोणं रक्तं च रेफाक्षरसमुद्भवम् । वहाँ चानिलमारोप्य रेफाक्षरसमुज्वलम् ॥
तीन कोणों से युक्त अग्नि, लाल रंग वाला एवं 'र' कार से संयुक्त होता है। अग्नि में वायु को आरोपित करके उस समुज्ज्वल 'र' कार को समन्वित करना चाहिए।
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